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कोविड-19: दक्षिण एशिया में 60 करोड़ बच्चों के जीवन में उलट-पुलट

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 दक्षिण एशियाई देशों में बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य क्षेत्रों में हुई प्रगति के लिए संकट का कारण बन रही है. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) ने मंगलवार को जारी अपनी नई रिपोर्ट में देशों की सरकारों से त्वरित  कार्रवाई का आग्रह किया है ताकि एक पूरी पीढ़ी की आशाओं और आकाँक्षाओं को बर्बाद होने से बचाया जा सके. महामारी दक्षिण एशिया क्षेत्र में भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश सहित अन्य देशों में तेज़ी से फैल रही है जहाँ विश्व की क़रीब एक चौथाई आबादी रहती है.

बच्चों के ख़िलाफ़ हिंसा पर रोक लगाने में नाकामी पर चेतावनी

दुनिया में कुल बच्चों की आधी आबादी यानि लगभग एक अरब बच्चे हर साल शारीरिक, यौन और मनोवैज्ञानिक हिंसा का शिकार होते हैं क्योंकि उनकी रक्षा के लिए स्थापित रणनीतियाँ लागू करने में देश विफल रहते हैं. गुरुवार को जारी संयुक्त राष्ट्र की एक नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है.

वोल्कान बोज़किर नए महासभा अध्यक्ष, भारत पहुँचा सुरक्षा परिषद में

संयुक्त राष्ट्र महासभा के 75वें सत्र के अध्यक्ष पद  के साथ-साथ सुरक्षा परिषद के पाँच अस्थाई सदस्यों के लिए चुनाव सम्पन्न हो गया. तुर्की के राजदूत वोल्कान बोज़किर को नया महासभा अध्यक्ष चुना गया है. आर्थिक व सामाजिक परिषद के भी 18 सदस्यों का चुनाव हुआ है. सुरक्षा परिषद की अस्थाई सदस्यता के लिए निर्वाचित होने वाले देशों में भारत भी शामिल है. 

सूखे व मरुस्थलीकरण को रोकने के लिए प्रकृति के साथ नए रिश्ते की दरकार

संयुक्त राष्ट्र ने मरुस्थलीकरण व सूखे से निपटने और प्रकृति की रक्षा के लिए एक ऐसा नया सम्बन्ध स्थापित करने की पुकार लगाई है जिससे भूमि क्षरण के कारण उत्पन्न होने वाली जबरन विस्थापन, भुखमरी और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का असरदार ढँग से मुक़ाबला किया जा सके. मरुस्थलीकरण व सूखा से निपटने के लिए मनाए जाने वाले विश्व दिवस (World Day to Combat Desertification and Drought) के अवसर पर इस वर्ष टिकाऊ उत्पादन और खपत की अहमियत पर ध्यान आकर्षित किया जा रहा है. 

कोविड-19 से बाल मज़दूरी बढ़ने का ख़तरा

‘कोविड-19 और बाल श्रम: संकट का समय, कार्रवाई का समय’ नामक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 से बाल मज़दूरी में 9 करोड़ 40 लाख की कमी आई है लेकिन अब इस प्रगति पर ख़तरे के बादल मँडरा रहे हैं. इस रिपोर्ट और बाल श्रम से जुड़े मुद्दों पर भारत में यूनीसेफ़ के बाल सुरक्षा विशेषज्ञ, मंसूर उमर क़ादरी ने अहम जानकारी साझा की. देखिए वीडियो इण्टरव्यू...
 

कोविड-19: पुनर्बहाली के लिए व्यवसायों को एसडीजी के निकट लाने के प्रयास

‘संयुक्त राष्ट्र ग्लोबल कॉम्पैक्ट लीडर्स समिट’ की 20वीं वर्षगाँठ पर 15 और 16 जून को एक वर्चुअल शिखर वार्ता का आयोजन किया गया जो लगातार 26 घण्टे तक चली. इस बैठक में व्यवसाय जगत, सरकार, संयुक्त राष्ट्र, नागरिक समाज और शिक्षा जगत की हस्तियों ने समावेशी अर्थव्यवस्थाओं और समाजों के पुनर्निर्माण, सामाजिक रूप से न्यायसंगत, कम कार्बन उत्सर्जन वाली और जलवायु अनुकूल दुनिया बनाने के लिए एक नया रास्ता तैयार करने पर चर्चा की. 

पृथ्वी का ख़याल करें, तुरन्त!

भारत की अनेक आस्था व धार्मिक हस्तियों ने इस वर्ष पर्यावरण दिवस के मौक़े पर पृथ्वी की धरोहर को सहेजने के लिए विभिन्न उपाय करने की अपील की है. इनमें प्रकृति को नुक़सान नहीं पहुँचाना और बड़े पैमाने पर पेड़ लगाना शामिल है. पृथ्वी और आने वाली पीढ़ियों की बेहतरी के लिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी है. इन धार्मिक हस्तियों का वीडियो सन्देश...

कोविड-19: लाखों बच्चों के बाल मज़दूरी के गर्त में धँसने का ख़तरा

पिछले दो दशकों के दौरान बाल श्रम  की समस्या से निपटने में एक बडी सफलता हासिल हुई है लेकिन वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण इन प्रयासों में अब तक हुई प्रगति को एक बड़ा झटका लगा है. अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) द्वारा जारी एक साझा रिपोर्ट में कोविड-19 संकट के कारण लाखों बच्चों के बाल मज़दूरी का शिकार होने की आशंका जताई गई है और सरकारों से बच्चों की सहायता के लिए उपायों में निवेश करने की पुकार लगाई है. 

कोविड-19: संकट के बाद की दुनिया में डिजिटल सहयोग के लिए नया रोडमैप

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेश ने कहा है कि कोविड-19 महामारी के दौरान डिजिटल टैक्नॉलॉजी के लाभ से वन्चित लोगों को स्वास्थ्य देखभाल से जुड़ी अहम जानकारी का ना मिल पाना उनके लिए जीवन-मरण का सवाल बन गया है. टैक्नॉलॉजी क्षेत्र में आ रहे तेज़ बदलावों से टिकाऊ विकास एजेंडा पर पड़ने वाले असर पर गुरुवार को चर्चा हुई, साथ ही डिजिटल सहयोग पर एक नया रोडमैप पेश किया गया है.  

अक्षय ऊर्जा उत्पादन में धन निवेश करना बुद्धिमानी

कोविड-19 महामारी से जीवाष्म ईंधन उद्योग जगत भी बुरी तरह प्रभावित हुआ, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की एक ताज़ा रिपोर्ट दिखाती है कि ऐसे माहौल में ग़ैर-परम्परागत या अक्षय (नवीनीकरणीय) ऊर्जा पहले से कहीं ज़्यादा किफ़ायती साबित ह रही है. इससे तमाम देशों में आर्थिक पुनर्बहाली के लिए बनाई जाने वाली राष्ट्रीय आर्थिक नीतियों में स्वच्छ ऊर्जा को प्राथमिकता पर रखने का एक अवसर भी मिला है. ऐसे होने से दुनिया पेरिस समझौते में निर्धारित लक्ष्यों को हासिल करने के ज़्यादा नज़दीक होगी.