स्वास्थ्य

कोविड-19: बिना योजना के अर्थव्यवस्थाओं को खोलना ‘बन सकता है त्रासदीपूर्ण’ 

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने कहा है कि अगर देश वैश्विक महामारी कोविड-19 से बचाव के ऐहतियाती उपायों के मद्देनज़र लागू पाबन्दियाँ हटाना चाहते हैं तो फिर उन्हें पहले संक्रमण के फैलाव पर क़ाबू पाने और लोगों की ज़िन्दगियाँ बचाने के लिये गम्भीरता बरतनी होगी. यूएन एजेंसी प्रमुख ने सोमवार को जिनीवा में पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए ऐसे उपायों की जानकारी सामने रखी जिनके ज़रिये समाजों व अर्थव्यवस्थाओं को फिर से पटरी पर लाया जा सकता है. 

कोविड-19 सर्वे: 90 फ़ीसदी देशों में ज़रूरी स्वास्थ्य सेवाओं में व्यवधान

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के एक ताज़ा सर्वेक्षण के नतीजे दर्शाते हैं कि वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण अधिकाँश देशों की स्वास्थ्य प्रणालियों पर भारी असर पड़ा है. इस सर्वे में हिस्सा लेने वाले 105 में से लगभग 90 प्रतिशत देशों में स्वास्थ्य सेवाओं में किसी ना किसी प्रकार का व्यवधान आया है जिनमें निम्न और मध्य आय वाले देशों को सबसे ज़्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है. 

कोविड-19: क्या किसी को एक बार से ज़्यादा भी संक्रमण हो सकता है!

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने कहा है किसी व्यक्ति के कोविड-19 से एक बार संक्रमित होने के बाद दोबारा भी उसके संक्रमण का शिकार होने की बहुत कम सम्भावना है. यूएन स्वास्थ्य एजेंसी की ये ताज़ा जानकारी उन ख़बरों के सन्दर्भ में आई है जिनमें कहा गया था कि हाँगकाँग में एक व्यक्ति को कोविड-19 का संक्रमण होने के चार महीने बाद फिर से संक्रमण हो गया.

रोहिंज्या शरणार्थी, 3 साल बाद, पहले से कहीं ज़्यादा असहाय

संयुक्त राष्ट्र की विभिन्न एजेंसियों का कहना है कि तीन साल पहले म्याँमार में रहने वाले रोहिंज्या लोगों को उनके घरों से बाहर निकाल दिया गया था जिसके बाद उन्हें सीमा पार बांग्लादेश के शरणार्थी शिविरों में पनाह लेनी पड़ी थी. रोहिंज्या शरणार्थी संकट के तीन वर्ष गुज़र जाने के बाद भी बेघर रोहिंज्या महिलाएँ, पुरुष और बच्चे पहले से कहीं ज़्यादा असहाय हालात में हैं.

कोविड-19: कोवैक्स मुहिम में शामिल होना ही एक मात्र प्रभावी विकल्प

विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख ने कहा है कि वैश्विक महामारी कोविड-19 की चपेट से बाहर निकलने का एक मात्र तरीक़ा एक ऐसी व्यवस्था में संसाधन निवेश करना है जिसके ज़रिये सभी देशों को कोविड-19 की वैक्सीन न्यायसंगत रूप में और सही समय पर मिले.

पाकिस्तान में पोलियो की चुनौती में अफ़वाहों से भी मुक़ाबला

इन्सान को अपाहिज बना देने वाली, और कभी-कभी तो जानलेवा साबित होने वाली बीमारी पोलियो दुनिया के ज़्यादातर देशों में ख़त्म की जा चुकी है, मगर पाकिस्तान में ये अब भी एक बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनी हुई है. इसका एक बड़ा कारण ये भी है कि पाकिस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा पोलियो से बचाने वाली दवा के टीके लगवाने का विरोध करता है. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष यूनीसेफ़ ने पाकिस्तान में पोलियो को जड़ से मिटाने और लोगों की ज़िन्दगियाँ बचाने के लिये एक ताज़ा अभियान शुरू किया है. ये अभियान चलाने वाली टीम के एक सदस्य और स्वास्थ्यकर्मी डेनिस चिमेन्या ने यूएन न्यूज़ के साथ ख़ास बातचीत की...

कोविड-19 के बावजूद पोलियो के ख़िलाफ़ मुहिम

पाकिस्तान में यूनीसेफ़ की एक स्टाफ़ सदस्य हुसना गुल कोविड-19 वायरस का संक्रमण होने के बाद के हालात से जूझते हुए भी ये सुनिश्चित करने में जी-जान से जुटी हुई हैं कि ज़्यादा से ज़्यादा बच्चों को पोलियो से बचाने वाली दवाई पिलाई जी सके.

कोविड-19: ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ के ख़िलाफ़ चेतावनी, न्यायसंगत वितरण पर बल 

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 की रोकथाम के लिए असरदार वैक्सीन विकसित करने के प्रयासों के बीच विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के महानिदेशक डॉक्टर टैड्रॉस एडहेनॉम घेबरेयेसस ने “वैक्सीन राष्ट्रवाद” के ख़तरे के प्रति सचेत किया है. उन्होंने दोहराया है कि कोरोनावायरस संकट पर पार पाने के लिए वैश्विक एकजुटता बेहद अहम है और कोई भी कहीं भी तब तक सुरक्षित नहीं है जब तक हर एक हर जगह सुरक्षित नहीं है.

कोविड-19: बाल संरक्षण व सामाजिक सेवाओं में व्यवधान बना चुनौती

विश्वव्यापी महामारी कोविड-19 के कारण घरेलू हिंसा की रोकथाम और ज़रूरी सहायता सेवाओं में आए व्यवधान से 100 से ज़्यादा देशों मे बच्चे शोषण व दुर्व्यवहार का शिकार होने के जोखिम का सामना कर रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के एक नए सर्वेक्षण में यह बात सामने आई है.  यूनीसेफ़ ने कहा है कि सरकारों को जल्द दीर्घकालीन उपायों को अपनाते हुए बाल हेल्पलाइन सेवाओं को मज़बूत बनाना होगा और सामाजिक सेवाओं में निवेश करना होगा ताकि बच्चों को इस ख़तरे से बचाया जा सके.

कोविड-19: स्कूलों में स्वच्छ जल व हाथ धोने की सुविधा का प्रबंध ज़रूरी

दुनिया में लगभग 82 करोड़ बच्चों के पास स्कूलों में हाथ धोने की बुनियादी सुविधाओं का अभाव है जिससे उनके कोविड-19 महामारी और अन्य संक्रामक बीमारियों से संक्रमित होने का ख़तरा ज़्यादा है. संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के साझा निगरानी कार्यक्रम द्वारा गुरुवार को जारी नई रिपोर्ट के आँकड़े दर्शाते हैं कि विश्व के हर पाँच में से दो स्कूलों में महामारी से पहले ही इन मूलभूत सुविधाओं की कमी थी. यूएन एजेंसियों के मुताबिक साफ़-सफ़ाई का समुचित प्रबंध किया जाना स्कूलों को फिर खोले जाने की एक अनिवार्य शर्त है.