वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां

आवास, केवल घर नहीं, बल्कि पूरी शहरी व्यवस्था का हिस्सा है - यूएन रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर

अज़रबैजान के बाकू में विश्व शहरी मंच के एक सत्र में भाग लेते, भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर, स्टेफ़ान प्रीज़नर.
© UN India अज़रबैजान के बाकू में विश्व शहरी मंच के एक सत्र में भाग लेते, भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर, स्टेफ़ान प्रीज़नर.

आवास, केवल घर नहीं, बल्कि पूरी शहरी व्यवस्था का हिस्सा है - यूएन रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर

आर्थिक विकास

भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर स्टेफ़ान प्रीज़नर ने कहा है कि आवास को अब मात्र एक घर बनाने की प्रक्रिया के रूप में नहींबल्कि बड़ी शहरी व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखा जाना होगा. उन्होंने अज़रबैजान में 'विश्व शहरी मंच' के 13वें सत्र के दौरान यूएन न्यूज़ के साथ एक बातचीत में कहा कि लोगों तक जल, स्वच्छता, परिवहन, आजीविका, सुरक्षा, डिजिटल सेवाओं और जलवायु सहनसक्षमता पहुँचाना भी उतना ही ज़रूरी है.

दुनिया भर में लोगों के लिए बेहतर आवास व्यवस्था सुनिश्चित करने, नई सोच को बढ़ावा देने और एक नए रोडमैप पर आगे बढ़ने के आग्रह के साथ, अज़रबैजान की राजधानी बाकू में आयोजित विश्व शहरी मंच के 13वें सत्र का समापन हुआ. इस फ़ोरम में 57 हज़ार से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया, जोकि इसके इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी भागेदारी है.

वैश्विक आवास संकट से प्रभावित अरबों लोगों के लिए सामूहिक समाधानों पर हुई चर्चाओं के बाद “बाकू कार्रवाई पुकार” को 176 देशों से समर्थन मिला है और यह शहरी विकास के लिए एक साझा दिशा प्रस्तुत करती है.

भारत समेत अन्य विकासशील देशों ने भी इस मंच पर सक्रिय भागेदारी की, जहाँ शहरी भविष्य, आवास, जलवायु जोखिमों, वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता और समावेशी नियोजन पर अहम चर्चा हुई. 

इसी सिलसिले में, बाकू में उपस्थित भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर, स्टेफ़ान प्रीज़नर ने यूएन न्यूज़ के साथ एक विशेष बातचीत में आवास और शहरी विकास से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर अपना नज़रिया साझा किया.

(इस इंटरव्यू को स्पष्टता व संक्षिप्तता के लिए सम्पादित किया गया है.)

बाकू में विश्व शहरी मंच 13 के दौरान एक सत्र में भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर, स्टेफ़ान प्रीज़नर.
© Utsav Chaudhury, NIUA बाकू में विश्व शहरी मंच 13 के दौरान एक सत्र में भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर, स्टेफ़ान प्रीज़नर.

यूएन न्यूज़: विश्व शहरी मंच के 13वें सत्र के दौरान, भारत, दक्षिण एशिया और व्यापक 'वैश्विक दक्षिण' (global south) में तेज़ी से शहरीकरण कर रहे क्षेत्रों के लिए क्या महत्वपूर्ण सन्देश उभरकर सामने आए हैं?

स्टेफ़ान प्रीज़नर: भारत, दक्षिण एशिया और व्यापक वैश्विक दक्षिण के लिए, विश्व शहरी मंच से मेरी पहली सीख यह है कि ऐसे मंच बहुत महत्वपूर्ण हैं. ये हज़ारों लोगों और साझीदारों को साथ लाते हैं, जिनका साझा लक्ष्य सहनसक्षम, टिकाऊ और समावेशी शहरों का विकास है.

ऐसे मंच एक-दूसरे से सीखने का बड़ा अवसर देते हैं. सरकारों, अन्तरराष्ट्रीय संगठनों और निजी क्षेत्र से आए लोग अपने अनुभव एवं विचार साझा करते हैं. इसलिए, लोगों और संस्थाओं को साथ लाने की संयुक्त राष्ट्र की क्षमता, इस मंच की एक महत्वपूर्ण सीख है.

दूसरी सीख यह है कि आवास को केवल मकान बनाने या बुनियादी ढाँचे के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक शहरी विकास व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखना होगा. आवास को रोज़गार, सेवाओं और जलवायु सहनसक्षमता से जोड़ना ज़रूरी है.

तीसरी सीख यह है कि वैश्विक दक्षिण केवल बड़े शहरी बदलावों का केन्द्र नहीं, बल्कि नवाचार का भी स्रोत है. भारत में पदस्थ होने के कारण मुझे गर्व है कि भारत शहरी विकास सहित कई क्षेत्रों में नवाचार का एक प्रमुख केन्द्र है.

बाकू में विश्व शहरी मंच 13 के दौरान भारतीय पवेलियन में भारत के शहरी बदलाव पर प्रदर्शनी.
© UN India बाकू में विश्व शहरी मंच 13 के दौरान भारतीय पवेलियन में भारत के शहरी बदलाव पर प्रदर्शनी.

यूएन न्यूज़: भारत और दक्षिण एशिया के नज़रिए से, आज आवास और शहरी सुदृढ़ता से जुड़ी सबसे बड़ी चुनौतियाँ क्या हैं?

स्टेफ़ान प्रीज़नर: भारत और दक्षिण एशिया के सामने पहली बड़ी चुनौती तेज़ी से हो रहा शहरीकरण है. आवास की माँग बढ़ रही है, और साथ ही शहरों पर पानी, स्वच्छता, परिवहन, भूमि, वायु गुणवत्ता, सार्वजनिक सेवाओं एवं पर्यावरणीय प्रणालियों का दबाव भी बढ़ रहा है. इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि कितने घर बन रहे हैं, बल्कि यह भी है कि पूरी शहरी व्यवस्था कितनी समन्वित, समावेशी व टिकाऊ बन रही है.

दूसरी चुनौती जलवायु जोखिमों की है. अत्यधिक गर्मी, बाढ़ और जल संकट अब भविष्य की नहीं, आज की वास्तविकताएँ हैं. इनका सबसे गम्भीर असर कम आय वाले समुदायों पर पड़ता है, ख़ासतौर से, उन लोगों पर जो कम सेवाओं वाले या पर्यावरणीय रूप से नाज़ुक इलाक़ों में रहते हैं.

तीसरी चुनौती समावेशन की है. अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लोग, प्रवासी, महिलाएँ, बच्चे, अनौपचारिक श्रमिक और अन्य कमज़ोर समुदाय अक्सर शहरी योजनाओं में कम ही दिखाई देते हैं, जबकि असर सबसे ज़्यादा उन्हीं पर पड़ता है.

अच्छी बात यह है कि भारत इन चुनौतियों का अधिक समग्र तरीक़े से सामना कर रहा है. जलवायु-संवेदनशील योजना, सुरक्षित और समावेशी शहरी डिज़ाइन, तथा आवास को व्यापक अवसरों से जोड़ने पर अब ज़्यादा ध्यान दिया जा रहा है.

यूएन न्यूज़: विश्व शहरी मंच 13 में भारत की उपस्थिति के बारे में आपको सबसे ख़ास क्या लगा?

स्टेफ़ान प्रीज़नर: मैंने 'इंडिया पवेलियन' में कई सत्रों में भाग लिया. यह बहुत सुन्दर ढंग से तैयार किया गया था और इसमें भारत के शहरी विकास को सतत विकास लक्ष्यों से जोड़कर दिखाया गया था. इससे स्पष्ट हुआ कि शहरी विकास सभी सतत विकास लक्ष्यों से गहराई से जुड़ा है.

पवेलियन में भारत की बड़ी योजनाओं और कार्यक्रमों को भी प्रदर्शित किया गया, जिनके ज़रिये शहरीकरण की चुनौतियों से निपटा जा रहा है. इनमें प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी जैसी विशाल किफ़ायती आवास योजना शामिल है, जो 12.5 अरब लोगों को शामिल करती है.

इसके अलावा, किराये के आवास कार्यक्रम; लोगों तक सेवाएँ पहुँचाने के लिए अमृत जल और स्वच्छता कार्यक्रम; तथा हाल ही में शुरू किया गया शहरी चुनौती कोष, जो बड़े क्षमता-निर्माण प्रयास और आवास व शहरी विकास कॉरपोरेशन (HUDCO) से जुड़ा है.

मैं आवास और शहरी कार्य मंत्रालय को विश्व शहरी मंच के एक्सपो में भारत की प्रभावशाली उपस्थिति के लिए बधाई देता हूँ. मंत्रालय ने भारत के शहरी विकास से जुड़े अनुभवों और सीखों को बहुत अच्छे ढंग से प्रस्तुत किया, जिससे कई देशों के प्रतिनिधिमंडलों और आगंतुकों को लाभ हुआ.

मेरा मानना है कि भारत की नवाचार क्षमता, उसका विशाल पैमाना और व्यापक अनुभव, दक्षिण-दक्षिण सहयोग में उसे एक विशेष भूमिका देते हैं. भारत उन देशों के साथ अपने उपयोगी अनुभव साझा कर सकता है, जिनके पास शहरी विकास की चुनौतियों और समाधानों से निपटने का उतना अनुभव नहीं है.

यूएन न्यूज़: भारत में संयुक्त राष्ट्र एजेंसियाँ देश के शहरी बदलाव में किस तरह सहयोग कर रही हैं?

स्टेफ़ान प्रीज़नर: संयुक्त राष्ट्र भारत में शहरी विकास से जुड़े कई क्षेत्रों में सहयोग कर रहा है. मैं इसके तीन उदाहरण देना चाहूँगा.

पहला, सतत विकास लक्ष्यों से जुड़े शहर-स्तरीय आकलन. इन आकलनों के ज़रिये शहरों में सतत विकास लक्ष्यों और उनके लक्ष्यों को समझा जाता है, ताकि कई साझीदारों के सहयोग से शहरी योजना को बेहतर जानकारी के आधार पर तैयार किया जा सके.

दूसरा, जलवायु सहनसक्षमता. बढ़ती गर्मी और बढ़ती आपदा-प्रवणता (Disaster proneness) के कारण यह एक बहुत महत्वपूर्ण मुद्दा है. शहरों की जलवायु सहनसक्षमता बढ़ाने के लिए हरित उपायों और सामुदायिक भागेदारी, दोनों का उपयोग किया गया है.

तीसरा, कमज़ोर समूहों, विशेष रूप से महिलाओं और बच्चों के लिए सुरक्षित स्थानों को भी समर्थन दिया गया है.

संयुक्त राष्ट्र प्रणाली की विभिन्न एजेंसियाँ इन क्षेत्रों में सहयोग कर रही हैं - यूएन पर्यावास संगठन की योजना व टिकाऊ आवास से जुड़ी पहल, बाल ज़रूरतों के अनुरूप यूनीसेफ़ की शहरी व्यवस्था, यूएन वीमेन के सुरक्षित शहरों से जुड़े प्रयास, एफ़एओ के हरित शहरी पारिस्थितिकी तंत्र, यूनेस्को का शहरी जल संरक्षण, और यूएनडीपी का कमज़ोर शहरी कामगारों के लिए समर्थन.

विश्व शहरी मंच सम्मेलन में एक महिला और एक पुरुष एक शहर के विस्तृत वास्तुकला मॉडल की जांच कर रहे हैं।
© UN News विश्व शहरी मंच के 13वें सत्र के दौरान अर्बन एक्सपो में प्रदर्शित स्मार्ट सिटी मॉडल.

यूएन न्यूज़: मौजूदा कार्यक्रमों से आगे बढ़कर, भारतीय शहरों को अधिक समावेशी, सहनसक्षम और भविष्य के लिए तैयार बनाने में संयुक्त राष्ट्र क्या भूमिका निभा सकता है?

स्टेफ़ान प्रीज़नर: आगे की दिशा में, मुझे लगता है कि संयुक्त राष्ट्र प्रणालीगत समाधान देने में और अधिक सहयोग कर सकता है. इसमें डेटा का बेहतर उपयोग शामिल है, ताकि समावेशी और सहनसक्षम शहरों के लिए अधिक सटीक कार्यक्रम तैयार किए जा सकें.

दूसरा क्षेत्र वित्तपोषण का है. संयुक्त राष्ट्र ऐसे कार्यक्रम तैयार करने में मदद कर सकता है, जो प्रमाणों पर आधारित हों और आगे चलकर वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता के योग्य परियोजनाएँ बन सकें.

तीसरा क्षेत्र शासन से जुड़ी जटिलताओं का है. शहरी विकास में पर्यावरण, आवास, भूमि, सुरक्षा और कई अन्य क्षेत्र शामिल होते हैं. इसलिए, अलग-अलग क्षेत्रों और संस्थाओं के बीच बेहतर तालमेल बहुत ज़रूरी है.

संयुक्त राष्ट्र प्रणाली की एक बड़ी ताक़त यह है कि उसकी अलग-अलग एजेंसियाँ शहरी मुद्दों को अलग-अलग दृष्टिकोणों से देखती हैं. “वन यूएन” दृष्टिकोण के तहत हमारी भूमिका नीति-स्तर की महत्वाकांक्षाओं को स्थानीय स्तर पर लागू करने से जोड़ने की है. 

साथ ही, यह सुनिश्चित करना भी ज़रूरी है कि शहरी प्रगति को केवल इस आधार पर न मापा जाए कि क्या बनाया गया है, बल्कि इस आधार पर भी कि शहर कितने न्यायपूर्ण, सहनसक्षम एवं लोगों की ज़रूरतों के प्रति संवेदनशील बन रहे हैं.

बाकू में वर्ल्ड अर्बन फोरम 13 के एक प्रदर्शनी क्षेत्र में आगंतुक चल रहे हैं, जिसमें एक वक्राकार समयरेखा प्रदर्शन और एक बड़ी 'एरेना' संरचना शामिल है।
© UN News Photo अज़रबैजान के बाकू में यूएन-हैबिटैट पवेलियन.

अन्त में, मेरे विचार में दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका बहुत अहम रहेगी. भारत में कई अच्छी सीखें और पद्धतियाँ विकसित हुई हैं, जिन्हें अन्य देशों के साथ साझा किया जाना चाहिए. 

संयुक्त राष्ट्र केवल दूसरे देशों से सीख लाने का माध्यम नहीं है, बल्कि भारत के अनुभवों को साझा करने में भी मदद कर सकता है - ऐसे अनुभव, जो पैमाने, गहराई और नवाचार के लिहाज़ से बहुत प्रभावशाली हैं.