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संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष, ऐनालेना बेयरबॉक ने नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में पत्रकारों को सम्बोधित किया.

'80 साल के दौरान एक भी महिला नहीं बन सकी है यूएन प्रमुख, भला क्यों', 'ऐनालेना बेयरबॉक

© UN India/Blassy Boben संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष, ऐनालेना बेयरबॉक ने नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में पत्रकारों को सम्बोधित किया.

'80 साल के दौरान एक भी महिला नहीं बन सकी है यूएन प्रमुख, भला क्यों', 'ऐनालेना बेयरबॉक

अंशु शर्मा, नई दिल्ली
यूएन मामले

संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने कहा है कि यह विश्व संगठन, लैंगिक समानता की बात करता है मगर इसके 80 वर्ष के अस्तित्व के दौरान एक भी महिला को इसकी बागडोर सम्भालने का अवसर नहीं मिला है. उन्होंने अपनी भारत यात्रा के दौरान चेतावनी भरे शब्दों में ये भी कहा कि बहुपक्षवाद और अन्तरराष्ट्रीय क़ानून केवल दबाव में ही नहीं हैंबल्कि उन पर सीधा हमला हो रहा है.

यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने, वैश्विक सहयोग को मज़बूत करने और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रति नई प्रतिबद्धता की पुकार भी लगाई है. 

ऐनालेना बेयरबॉक, भारत सरकार के निमंत्रण पर एशिया की अपनी व्यापक यात्रा के तहत 28 अप्रैल को भारत पहुँचीं. 

उन्होंने अपनी भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर से मुलाक़ात की और कहा कि बहुपक्षीय समाधानों को आगे बढ़ाने में भारत एक अहम साझीदार है.

उन्होंने वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, भारत के इलैक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के प्रतिनिधियों, भारत में संयुक्त राष्ट्र देशीय टीम और भूटान में संयुक्त राष्ट्र देशीय टीम के प्रतिनिधियों से भी मुलाक़ात की. 

नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में, यूएन न्यूज़ के साथ ख़ास बातचीत में उन्होंने कहा कि बढ़ते भू-राजनैतिक विभाजन, शान्ति और सुरक्षा, विकास और मानवाधिकारों पर गम्भीर दबाव डाल रहे हैं. 

जलवायु परिवर्तन, वैश्विक स्वास्थ्य संकट, युद्धों और वैश्विक व्यापार में रुकावटों जैसी आपस में जुड़ी चुनौतियों से कोई भी देश अकेले नहीं निपट सकता.

उन्होंने संयुक्त राष्ट्र 80 सुधार प्रक्रिया का भी उल्लेख किया और कहा कि संगठन को ज़मीनी स्तर पर अधिक कुशल, जवाबदेह और प्रभावी बनना होगा.

(इंटरव्यू को स्पष्टता एवं संक्षिप्तता के लिए सम्पादित किया गया है.)

यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक, भारत यात्रा के दौरान पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए.
© UN India/Blassy Boben यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक, भारत यात्रा के दौरान पत्रकारों को सम्बोधित करते हुए.

यूएन न्यूज़: आप अपने कार्यकाल का आधे से अधिक समय पूरा कर चुकी हैं. आज आप बहुपक्षवाद की स्थिति को कैसे देखती हैं? और बढ़ते भू-राजनैतिक तनावों के बीच पदभार सम्भालने के बाद से आपका नज़रिया किस तरह बदला है?

ऐनालेना बेयरबॉक: दुनिया कभी भी पूरी तरह शान्तिपूर्ण नहीं रही. जब मैंने सितम्बर में 80वें सत्र की शुरुआत की थी, तब मैंने राष्ट्राध्यक्षों से अन्तरराष्ट्रीय शान्ति व्यवस्था के समर्थन में खड़े होने की अपील की थी, क्योंकि उस समय भी संयुक्त राष्ट्र दबाव में था.

लेकिन इस वर्ष की शुरुआत से मुझे सदस्य देशों से संयुक्त राष्ट्र चार्टर की रक्षा करने का आहवान करना पड़ा, क्योंकि अब उस पर सीधा हमला हो रहा है - यहाँ तक कि सुरक्षा परिषद के कुछ स्थाई सदस्यों की ओर से भी, जिनकी ज़िम्मेदारी अन्तरराष्ट्रीय शान्ति व सुरक्षा और चार्टर की रक्षा करना है.

वीटो अधिकार केवल अधिकार नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारी भी है. इसलिए महासभा अध्यक्ष के रूप में मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता चार्टर व संयुक्त राष्ट्र की रक्षा करना, और इस उद्देश्य से विभिन्न देशों को साथ लाना है.

यूएन न्यूज़: वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है. आलोचकों का मानना है कि यह संगठन, टकरावों और युद्धों को रोकने में प्रभावी नहीं रहा है - विशेषकर मध्य पूर्व में. आप उन लोगों को क्या जवाब देंगी, जो मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र अब अपने उद्देश्य के अनुरूप काम नहीं कर पा रहा है?

ऐनालेना बेयरबॉक: शान्ति और सुरक्षा के लिए खड़े होना कभी आसान नहीं रहा. संयुक्त राष्ट्र की स्थापना दो विनाशकारी विश्व युद्धों के बाद हुई थी, और पिछले 80 वर्षों के हर दशक में गम्भीर टकराव होते रहे हैं.

लेकिन हाल के वर्षों में टकरावों की तीव्रता और क्रूरता बढ़ी है. हम सूडान जैसे स्थानों पर मानवाधिकारों और अन्तरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून के गम्भीर उल्लंघन देख रहे हैं. लेबनान में संयुक्त राष्ट्र शान्तिरक्षकों पर सीधे हमले भी इसी बढ़ते असम्मान को दिखाते हैं.

इसलिए यूएन चार्टर, अन्तरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून और उनके सिद्धान्तों की रक्षा के लिए सदस्य देशों की प्रतिबद्धता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.

संयुक्त राष्ट्र, शान्ति वार्ताओं के लिए सेतु की भूमिका निभा सकता है, लेकिन अकेले शान्ति नहीं ला सकता. यह सदस्य देशों पर निर्भर करता है. जब कोई सदस्य देश चार्टर का गम्भीर उल्लंघन करता है, या आक्रामक युद्ध शुरू करता है, तो यह संयुक्त राष्ट्र की नहीं, उस सदस्य देश की विफलता है.

संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने नई दिल्ली में भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर से मुलाक़ात की.
© Ministry of External Affairs/Government of India संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक ने नई दिल्ली में भारत के विदेश मंत्री डॉक्टर एस जयशंकर से मुलाक़ात की.

यूएन न्यूज़: संयुक्त राष्ट्र की स्थापना को 80 वर्ष हो चुके हैं और तब से दुनिया बहुत बदल चुकी है. यूएन80 सुधार प्रक्रिया, सुरक्षा परिषद को अधिक न्यायसंगत और प्रतिनिधिक बनाने जैसे कठिन राजनैतिक सुधारों को किस तरह आगे बढ़ा सकती है?

ऐनालेना बेयरबॉक: इसमें कोई सन्देह नहीं है कि 80 वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र में गहरे सुधारों की ज़रूरत है. हमें इक्कीसवीं सदी की चुनौतियों के अनुरूप ख़ुद को ढालना होगा, डिजिटल तकनीक से मिलने वाले अवसरों को अपनाना होगा, और ज़मीनी स्तर पर अपने काम को अधिक कुशल, स्पष्ट व प्रभावी बनाना होगा.

इसीलिए संयुक्त राष्ट्र 80 सुधार प्रक्रिया के तहत शासनादेशों, यानि संगठन की ज़िम्मेदारियों, की समीक्षा की जा रही है. आज संयुक्त राष्ट्र के पास 40 हज़ार से अधिक शासनादेश हैं, जो बहुत ज़्यादा हैं. 

महासभा ने सदस्य देशों के बहुमत से यह निर्णय लिया है कि शासनादेशों में समय-सीमा तय करने वाले प्रावधान, यानि ‘सनसेट क्लॉज़’ जोड़े जाएँ और महासचिव की रिपोर्टों की संख्या सीमित की जाए.

इसके साथ ही, कार्यधारा 3 के तहत महासचिव और उनकी टीम अलग-अलग एजेंसियों के काम में बेहतर तालमेल लाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि विश्व स्वास्थ्य संगठनविश्व खाद्य कार्यक्रम, यूनीसेफ़ आदि एजेंसियों के बीच दोहराव कम हो.

लेकिन हमें उन लोगों से सावधान रहना चाहिए, जो जानबूझकर संयुक्त राष्ट्र को कमज़ोर करना चाहते हैं. सुधार तभी सुधार होगा, जब वह संयुक्त राष्ट्र को मज़बूत बनाए, कमज़ोर नहीं.

आज संयुक्त राष्ट्र जिस वित्तीय संकट का सामना कर रहा है, उसका एक बड़ा कारण यह है कि कुछ सदस्य देश - विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका - अपनी देय राशि न तो पूरी तरह चुका रहे हैं और न ही समय पर. इसलिए विश्व खाद्य कार्यक्रम व शान्तिरक्षा जैसे क्षेत्रों में गम्भीर कटौतियाँ, सदस्य देशों के भुगतान में कमी और देरी से जुड़ी हुई हैं.

यूएन न्यूज़: महासभा की एक महिला अध्यक्ष के रूप में, संयुक्त राष्ट्र में पहली महिला महासचिव चुने जाने की सम्भावना को आप कैसे देखती हैं? और अगर ऐसा होता है, तो इसका संगठन और दुनिया के लिए क्या महत्व होगा?

भारत यात्रा के दौरान, यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक, नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर स्टेफ़ान प्रीज़नर (बाएँ) और भूटान में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर गौरव रे (दाएँ) के साथ.
© UN India/Blassy Boben भारत यात्रा के दौरान, यूएन महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक, नई दिल्ली स्थित यूएन हाउस में भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर स्टेफ़ान प्रीज़नर (बाएँ) और भूटान में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेंट कोऑर्डिनेटर गौरव रे (दाएँ) के साथ.

ऐनालेना बेयरबॉक: महिलाओं के अधिकार, मानवाधिकार हैं, और मानवाधिकार, महिलाओं के अधिकार हैं. यह केवल एक अच्छा नारा नहीं, बल्कि शान्ति, सुरक्षा और टिकाऊ विकास के लिए बेहद ज़रूरी सिद्धान्त है.

अगर महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं, तो समाज में कोई भी सुरक्षित नहीं है. हम देखते हैं कि जब महिलाएँ शान्ति वार्ताओं में शामिल होती हैं, तो समझौते अधिक समय तक टिकते हैं. टिकाऊ विकास लक्ष्यों को हासिल करना भी तभी सम्भव है, जब वे महिलाओं और लड़कियों के लिए उतने ही समावेशी हों, जितने पुरुषों और लड़कों के लिए.

यह समझाना मुश्किल है कि जो संस्था मानवाधिकारों, टिकाऊ विकास, शान्ति और सुरक्षा के सिद्धान्तों के लिए खड़ी है, उसमें 80 वर्षों के दौरान, कभी कोई महिला महासचिव क्यों नहीं रही.

जब दुनिया की आधी आबादी - यानि लगभग चार अरब लोग, महिलाएँ और लड़कियाँ हैं, तो यह अपने ही सिद्धान्तों और मूल्यों पर ख़रा उतरने का सवाल भी है.

यूएन न्यूज़: मौजूदा वैश्विक व्यवस्था में आप भारत और वैश्विक दक्षिण की भूमिका को किस तरह देखती हैं? और वे अपने प्रभाव का उपयोग वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया को अधिक न्यायसंगत तथा प्रभावी बनाने के लिए कैसे कर सकते हैं?

ऐनालेना बेयरबॉक: संयुक्त राष्ट्र उतना ही मज़बूत है, जितनी उसके सदस्य देशों की प्रतिबद्धता. आज जब संयुक्त राष्ट्र के सिद्धान्तों पर सीधा हमला हो रहा है - चाहे शान्ति एवं सुरक्षा के उल्लंघन के रूप में, जलवायु संकट को नकारने के रूप में, या महिलाओं और लड़कियों के मानवाधिकारों से इनकार के रूप में - तब मिलकर खड़ा होना पहले से कहीं अधिक ज़रूरी है.

छोटे सदस्य देशों के लिए भू-राजनैतिक दबाव के बीच अकेले खड़ा होना कठिन है. इसलिए सभी महाद्वीपों से ऐसे गठबंधनों की ज़रूरत है, जो चार्टर और सभी लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा करें.

भारत जैसे देश - जो आबादी के लिहाज़ से दुनिया का सबसे बड़ा देश है और एक लोकतंत्र भी है - इस सहयोग को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं. दुनिया भर में ऐसे देशों और लोगों का विशाल बहुमत है; अगर वे एकजुट हो जाएँ, तो उनकी गति अलग ही नज़र आएगी.

संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक, नई दिल्ली स्थित महात्मा गाँधी स्मारक में श्रद्धाँजलि अर्पित करते हुए.
© UN India/Blassy Boben संयुक्त राष्ट्र महासभा अध्यक्ष ऐनालेना बेयरबॉक, नई दिल्ली स्थित महात्मा गाँधी स्मारक में श्रद्धाँजलि अर्पित करते हुए.

यूएन न्यूज़: आपकी भारत यात्रा बहुत छोटी रही. इस यात्रा से आपके मुख्य अनुभव क्या रहे?

ऐनालेना बेयरबॉक: भारत आने पर बहुपक्षवाद के प्रति उत्साह सचमुच महसूस होता है. यहाँ अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग हैं, और विवादों के शान्तिपूर्ण समाधान के प्रति गहरी प्रतिबद्धता भी दिखाई देती है.

मैं जब भी भारत आती हूँ, अलग-अलग स्मारकों पर जाती हूँ. आज मैंने गाँधी स्मारक से शुरुआत की. यह याद दिलाता है कि विवादों का शान्तिपूर्ण समाधान और लोगों की शक्ति में विश्वास, दरअसल भारत के डीएनए में है.