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आवास संकट अब वैश्विक आपदा, धनी-निर्धन सभी प्रभावित - UN Habitat प्रमुख

UN-Habitat की कार्यकारी निदेशक, अनाक्लॉदिया रोसबाख़, नई दिल्ली में यूएन न्यूज़ से बातचीत करते हुए.
© UN India/Blassy Boben UN-Habitat की कार्यकारी निदेशक, अनाक्लॉदिया रोसबाख़, नई दिल्ली में यूएन न्यूज़ से बातचीत करते हुए.

आवास संकट अब वैश्विक आपदा, धनी-निर्धन सभी प्रभावित - UN Habitat प्रमुख

एसडीजी

संयुक्त राष्ट्र की पर्यावास एजेंसी - UN-Habitat ने चेतावनी दी है कि बढ़ती असमानता, जलवायु परिवर्तन का दबाव और तेज़ नगरीकरण, दुनिया भर में आवास संकट को और गम्भीर बना रहे हैं. इसका सबसे अधिक असर अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले लाखों लोगों पर पड़ रहा है, जो बढ़ते जोखिमों का सामना कर रहे हैं.

एजेंसी का कहना है कि इस स्थिति से निपटने के लिए सस्ते, जलवायु-सहिष्णु आवास और समावेशी शहरी योजना की तत्काल आवश्यकता है.

दुनिया भर में लगभग तीन अरब लोग पर्याप्त आवास से वंचित हैं. यूएन पर्यावास की कार्यकारी निदेशक अनाक्लॉदिया रोसबाख़ ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में बताया कि जो समस्या कभी मुख्य रूप से विकासशील देशों तक सीमित मानी जाती थी, वह अब अमीर और ग़रीब सभी देशों को प्रभावित करने वाला वैश्विक संकट बन गई है.

(इंटरव्यू को स्पष्टता के लिए सम्पादित किया गया है).

यूएन न्यूज़ - दुनिया भर में लगभग तीन अरब लोगों के पास पर्याप्त आवास नहीं है. वैश्विक दृष्टिकोण से आज के आवास संकट का सबसे बड़ा कारण क्या है?

अनाक्लॉदिया रोसबाख़ - यदि एक ही सबसे बड़ा कारण बताना हो, तो मैं कहूँगी कि वह असमानता और ग़रीबी है. यही मूल कारण है, क्योंकि अन्ततः किराए पर घर लेने, ख़रीदने या अपने घर में टिके रहने के लिए, लोगों के पास पर्याप्त धन नहीं होता.

यूएन न्यूज़ - दक्षिण एशिया दुनिया में सबसे तेज़ी से हो रहे नगरीकरण वाले क्षेत्रों में से एक है. यहाँ शहरी विकास अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण क्यों है?

अनाक्लॉदिया रोसबाख़ - हम कई संकटों के दौर से गुज़र रहे हैं, जो हमारे ग्रह पर बढ़ता दबाव डाल रहे हैं. इनमें सबसे महत्वपूर्ण जलवायु संकट है. जलवायु से जुड़ी घटनाएँ अधिक बार और अधिक तीव्र हो रही हैं, और उनका सबसे ज़्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जो पहले से ही असुरक्षित परिस्थितियों में रह रहे हैं - अपर्याप्त आवास में और बुनियादी सुविधाओं की कमी के साथ.

इसका परिणाम यह है कि नगरीकरण का दबाव और वैश्विक आवास की कमी, जलवायु परिवर्तन के कारण और बढ़ रही है. जो समुदाय इन चुनौतियों का सामना करने के लिए सबसे कम तैयार हैं, वही सबसे बड़े जोखिम झेल रहे हैं. इससे स्पष्ट होता है कि जलवायु-सहनसक्षम आवास, मज़बूत बुनियादी ढाँचे और समावेशी शहरी योजना की तत्काल आवश्यकता है.

यूएन न्यूज़ - यह चुनौती, विकसित देशों की तुलना में विकासशील देशों के लिए किस तरह अलग है?

अनाक्लॉदिया रोसबाख़ - आज आवास से जुड़ी सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि यह एक साझा वैश्विक चुनौती बन चुकी है - उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम सभी क्षेत्रों के देशों को प्रभावित कर रही है. इस अर्थ में यह सचमुच पूरी दुनिया का संकट है. लगभग हर देश किसी न किसी रूप में आवास की कमी का सामना कर रहा है, जिससे यह एक साझा वैश्विक समस्या बन गई है.

वैश्विक उत्तर में सबसे नई और गम्भीर समस्या किफ़ायती आवास की है. उत्तरी अमेरिका और योरोप में कई परिवार - विशेषकर युवजन - अब अपने माता-पिता के पास स्थित इलाक़ों में रहना तो दूर, कभी-कभी घर ख़रीदने का ख़र्च ही नहीं वहन कर पाते. वहीं बुज़ुर्गों के लिए अपने घरों में बने रहना मुश्किल हो रहा है. साथ ही जलवायु लक्ष्यों के अनुरूप इमारतों और बुनियादी ढाँचे को बदलना महँगा है, जिससे परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव पड़ रहा है.

वैश्विक दक्षिण में चुनौती अलग है, लेकिन उतनी ही गम्भीर. वहाँ व्यापक रूप से अनौपचारिक बस्तियाँ मौजूद हैं, जिनमें एक अरब से अधिक लोग रहते हैं. 

दुनिया भर में लगभग 30 करोड़ लोग बेघर हैं - यह स्थिति विकसित और विकासशील दोनों क्षेत्रों में दिखाई देती है, योरोप, अमेरिका और कैनेडा के शहरों से लेकर भारत व ब्राज़ील तक.

इस तरह, आवास की समस्याएँ रूप में भले अलग हों, लेकिन उनकी जड़ें समान हैं. किफ़ायती आवास सबसे बड़ी कमी बना हुआ है, और अब यह संकट केवल वैश्विक दक्षिण तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वैश्विक उत्तर को भी प्रभावित कर रहा है.

यूएन न्यूज़ - जब हम अनौपचारिक बस्तियों की बात करते हैं, तो अगर सरकारें चाहती हैं कि आवास सचमुच इन समुदायों तक पहुँचे, तो उन्हें क्या विशेष करना चाहिए?

अनाक्लॉदिया रोसबाख़ - हम यूएन पर्यावास के ‘आवास पर खुले कार्यसमूह’ के माध्यम से सदस्य देशों के साथ काम कर रहे हैं, जिसने पिछले वर्ष अनौपचारिक बस्तियों के रूपान्तरण पर सिफ़ारिशें दीं. इन सुझावों में विस्थापन को कम करने, मौजूदा आवास को उन्नत बनाने और पानी, बिजली व स्वच्छता जैसी बुनियादी सेवाओं के साथ स्कूल एवं क्लीनिक जैसी सामुदायिक सुविधाएँ बढ़ाने पर ज़ोर दिया गया है. 

एक प्रमुख सिद्धान्त एकीकरण है - अनौपचारिक बस्तियों को शहर का अभिन्न हिस्सा मानकर शहरी योजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए. इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर निरन्तर निवेश आवश्यक है, और कुछ मामलों में जोखिम कम करने के लिए पुनर्रचना या स्थानांतरण भी करना पड़ सकता है. 

कुल मिलाकर, सिफ़ारिशों में कहा गया है कि अनौपचारिक बस्तियों को राष्ट्रीय शहरी नीतियों का मूल हिस्सा माना जाना चाहिए.

यूएन न्यूज़ - जैसे-जैसे जलवायु जोखिम बढ़ रहे हैं, शहरों को आवास और बुनियादी ढाँचे को किस तरह नया रूप देना चाहिए ताकि सबसे कमज़ोर आबादी को पहले सुरक्षा मिल सके?

अनाक्लॉदिया रोसबाख़ - हमें सबसे पहले आवास और लोगों की रहने की परिस्थितियों पर ध्यान देना होगा. अनौपचारिक बस्तियों में रहने वाले बहुत से लोग पहले से ही संवेदनशील इलाक़ों में रहते हैं और जलवायु घटनाओं का सबसे ज़्यादा असर झेल रहे हैं. इसलिए ज़रूरी है कि घर सुरक्षित, मज़बूत और स्थानीय जलवायु के अनुरूप हों.

इस चुनौती से निपटने के लिए केवल मकानों को ही नहीं, बल्कि आसपास के बुनियादी ढाँचे को भी सुधारना होगा. शहरों को सार्वजनिक सेवाओं का विस्तार करना चाहिए और अधिक हरित सार्वजनिक स्थान बनाने चाहिए, जिससे हरियाली बढ़े तथा भीषण गर्मी का असर कम हो. जल संसाधनों की सुरक्षा और प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि पानी तक भरोसेमन्द पहुँच, समुदायों को जलवायु दबाव से निपटने में मदद करती है.

संक्षेप में, जलवायु-सहनसक्षम आवास, टिकाऊ शहरी डिज़ाइन और मज़बूत बुनियादी सेवाओं को साथ-साथ विकसित करना होगा, ताकि जोखिम कम हो व समुदाय, बदलती जलवायु के अनुसार ढल सकें.

यूएन न्यूज़ - इस प्रयास में यूएन पर्यावास, वैश्विक स्तर पर और विशेष रूप से भारत में किस तरह के प्रयास कर रहा है?

अनाक्लॉदिया रोसबाख़ - हमारा काम तीन मुख्य स्तम्भों पर आधारित है: नीतिगत मार्गदर्शन, पैरोकारी और तकनीकी सहायता. ‘आवास पर खुले कार्यसमूह’ जैसे प्रयासों के ज़रिए हम देशों को शहरी और आवास चुनौतियों के लिए नीतिगत ढाँचे विकसित करने में मदद करते हैं. 

हम कॉप जैसे वैश्विक जलवायु मंचों में सक्रिय रहते हैं और स्थानीय जलवायु कार्रवाई के समन्वय को मज़बूत करने के लिए मंत्री-स्तरीय संवाद आयोजित करते हैं. 

बाकू में विश्व शहरी मंच पर जारी होने वाली एक रिपोर्ट दिखाती है कि राष्ट्रीय जलवायु योजनाओं में शहरी घटक दोगुने हो गए हैं और नए उपायों में लगभग आधे आवास एवं अनौपचारिक बस्तियों से जुड़े हैं. यह जलवायु समाधान में शहरों की बढ़ती भूमिका दर्शाता है. 

तकनीकी सहायता के तहत हम सरकारों और शहरों को नीति निर्माण, सहनसक्षमता, आवास व सार्वजनिक स्थानों के विकास में सहयोग देते हैं, जिनमें भारत की मौजूदा पहलें भी शामिल हैं. भारत भी अपना अनुभव साझा करके, वैश्विक स्तर पर समाधानों के विस्तार में योगदान दे रहा है.

यूएन न्यूज़ - भारत जैसे अत्यधिक आबादी वाले देश में बुनियादी ढाँचे और आवास की पुनर्रचना कितना चुनौतीपूर्ण है?

अनाक्लॉदिया रोसबाख़ - ये चुनौतियाँ बहुत बड़ी हैं, लेकिन अवसर भी उतने ही बड़े हैं, इसलिए कई स्तरों पर एक साथ कार्रवाई ज़रूरी है. यूएन पर्यावास का मार्गदर्शक ढाँचा ‘नवीन शहरी एजेंडा,’ भागेदारी आधारित बहु-स्तरीय शासन और व्यापक जनसहभागिता पर ज़ोर देता है, ताकि शहरी परिवर्तन सफल हो सके. 

मज़बूत प्रशासनिक ढाँचे आवश्यक हैं, क्योंकि वास्तविक प्रगति, ठोस प्रक्रियाओं और संस्थानों पर निर्भर करती है जो कार्रवाई का समन्वय करें, सुधारों को बनाए रखें व नीतियों को ज़मीनी परिणामों में बदलें.

यूएन न्यूज़ - तेज़ शहरी विकास, असमानता और जलवायु जोखिम जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे अन्य विकासशील देशों की मदद करने में, भारत का शहरी अनुभव किस तरह सहायक हो सकता है?

अनाक्लॉदिया रोसबाख़ - हमें व्यावहारिक और हासिल किए जा सकने वाले समाधानों पर ध्यान देना चाहिए, और भारत इसके कई ठोस उदाहरण प्रस्तुत करता है. देश ने वित्त, प्रौद्योगिकी, शहरी योजना और अनौपचारिक बस्तियों के क्षेत्र में विविध समाधान विकसित किए हैं. 

सार्वजनिक-निजी भागेदारी, सशक्त नागरिक समाज और ज़मीनी स्तर से लेकर निजी क्षेत्र तक नवाचार ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

इन सभी अनुभवों और क्षमताओं के आधार पर भारत, वैश्विक स्तर पर शहरी विकास और आवास से जुड़े विमर्श एवं समाधानों में सार्थक योगदान दे सकता है.