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AI के लाभ सभी तक पहुँचना ज़रूरी, UNDRR प्रमुख कमल किशोर

भारत में एआई प्रभाव सम्मेलन में शामिल होने आए संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (UNDRR) के प्रमुख कमल किशोर
© UN News/Rohit Upadhyay भारत में एआई प्रभाव सम्मेलन में शामिल होने आए संयुक्त राष्ट्र आपदा जोखिम न्यूनीकरण कार्यालय (UNDRR) के प्रमुख कमल किशोर.

AI के लाभ सभी तक पहुँचना ज़रूरी, UNDRR प्रमुख कमल किशोर

जलवायु और पर्यावरण

आपदा जोखिम न्यूनीकरण (UNDRR) के अध्यक्ष और यूएन प्रमुख के विशेष प्रतिनिधि कमल किशोर का कहना है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का विकास समावेशी होना बेहद ज़रूरी है जिसमें सबकी भागेदारी हो, ताकि वैश्विक दक्षिण के देश पीछे नहीं छूटें और इसके लाभ सभी तक समान रूप से पहुँच सकें.

कमल किशोर ने, भारत की राजधानी नई दिल्ली में हाल में आयोजित 'AI Impact Summit 2026' के दौरान यूएन न्यूज़ से विशेष बातचीत में कहा कि एआई, आपदा प्रबंधन में क्रान्तिकारी बदलाव ला सकती है. जोखिम की पहले पहचान, प्रभावित क्षेत्रों का आकलन और समय रहते राहत पहुँचाने में इसकी बड़ी भूमिका हो सकती है. 

साथ ही उन्होंने आगाह भी किया कि एआई पर पूर्ण निर्भरता उचित नहीं है और इसका नैतिक उपयोग, निजता की सुरक्षा व मानवीय निगरानी आवश्यक हैं. एआई को बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए स्पष्ट नीतियाँ और दीर्घकालिक रणनीति ज़रूरी हैं. साथ ही, इसके विकास में सभी की भागेदारी होनी चाहिए.

(इंटरव्यू को स्पष्टता व संक्षिप्तता के लिए सम्पादित किया गया है)

यूएन न्यूज़: एआई प्रभाव सम्मेलन पहली बार भारत और वैश्विक दक्षिण में आयोजित हुआ. इसका क्या महत्व है?

कमल किशोर: कृत्रिम बुद्धिमत्ता तेज़ी से आगे बढ़ रही है, लेकिन चिन्ता की बात ये है कि वैश्विक दक्षिण के कई देशों के पीछे छूट जाने की सम्भावना है. एआई की प्रगति ऐसी होनी चाहिए जिसमें सबके हित शामिल हों और कोई पीछे नहीं रह जाए.

भारत की भूमिका यहाँ अहम है. वह देशों को साथ ला सकता है और सुनिश्चित कर सकता है कि एआई के लाभ कुछ लोगों या कुछ देशों तक सीमित नहीं रहें, बल्कि सभी तक समान रूप से पहुँचें. इससे विकासशील देशों की आवाज़ भी वैश्विक स्तर पर सुनी जा सकेगी और एआई का लाभ सबको मिलेगा.

यूएन न्यूज़: क्या वैश्विक दक्षिण में इसका आयोजन होना कोई महत्वपूर्ण सन्देश देता है?

कमल किशोर: हाँ. अक्सर विकासशील देश, एआई जैसी तकनीकी दौड़ में पीछे रह जाते हैं. कई देशों के पास पर्याप्त डेटा और डिजिटल कनैक्टिविटी नहीं होती, और ज़्यादातर नया शोध, विकसित देशों के सन्दर्भ में हो रहा है. 

इसलिए भारत का नेतृत्व महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह विकासशील देशों के दृष्टिकोण को सामने ला सकता है और यह सुनिश्चित कर सकता है कि एआई का लाभ सभी तक पहुँचे.

यूएन न्यूज़: एआई, आपदा प्रबंधन को किस तरह बेहतर बना सकती है और आपदाओं को त्रासदी बनने से किस तरह रोक सकती है?

कमल किशोर: एआई आपदा प्रबंधन को तेज़ी से बदल सकती है. यह आपदाओं का पहले अनुमान लगाने और यह पहचानने में मदद करती है कि कौन, कहाँ और क्यों प्रभावित होंगे. इससे समय रहते क़दम उठाकर नुक़सान कम किया जा सकता है. 

लम्बे समय में, एआई से यह विश्लेषण करना सम्भव हो सकता है कि शहर किस तरह फैल रहे हैं, क्या वे जोखिम वाले इलाक़ों में बढ़ रहे हैं, और इमारतें सुरक्षित बन रही हैं या नहीं. इस तरह जोखिम को पहले ही कम किया जा सकता है.

एक व्यक्ति नियंत्रण कक्ष में एक बड़ी स्क्रीन के सामने खड़ा है, जिस पर भारत के मौसम मानचित्रों के साथ एक प्रारंभिक चेतावनी प्रसार प्रणाली प्रदर्शित हो रही है।
© UNESCO

यूएन न्यूज़: किस प्रकार की आपदाओं में एआई का असर सबसे स्पष्ट दिखता है?

कमल किशोर: लगभग सभी प्रकार की आपदाओं में. उदाहरण के लिए जंगल की आग लें. यदि तापमान, आर्द्रता और हवा जैसी पुरानी जानकारियों का विश्लेषण किया जाए, तो आग लगने से पहले या उसके शुरुआती चरण में ही जोखिम की पहचान करके, चेतावनी दी जा सकती है. 

इसी तरह लू के दौरान अलग-अलग समुदायों पर असर अलग होता है. झुग्गी बस्तियों में रहने वाले लोग अधिक प्रभावित होते हैं, जबकि वातानुकूलित घरों में रहने वालों पर असर कम होता है. एआई इन कारकों का तेज़ी से विश्लेषण कर यह बता सकती है कि राहत कहाँ तुरन्त पहुँचानी है. इस तरह यह कई प्रकार की आपदाओं में नुक़सान कम करने में मदद की जा सकती है.

यूएन न्यूज़: क्या कोई ऐसे वास्तविक उदाहरण हैं जहाँ एआई पहले से कारगर साबित हो रही है?
कमल किशोर: हाँ. पटना के पास गंगा नदी क्षेत्र में बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली विकसित की गई है, जिसमें एआई का उपयोग होता है. यह पारम्परिक प्रणालियों की तुलना में अधिक तेज़ और अधिक सटीक है. 

लेकिन यह ज़रूरी है कि ऐसी तकनीक केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहे. इसे समुदायों से जोड़ा जाए और स्थानीय ज़रूरतों के अनुसार तैयार किया जाए.

यूएन न्यूज़: जब जीवन और आजीविका दाँव पर हों, तो एआई पर अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिए किन सुरक्षा उपायों की ज़रूरत है?

कमल किशोर: सबसे पहले, आपदा प्रबंधन में एआई का उपयोग नैतिक तरीक़े से होना चाहिए. इसके लाभ सब तक पहुँचने चाहिए और निजता से जुड़े मुद्दों का ध्यान रखना ज़रूरी है. 

कोई भी प्रणाली पूरी तरह तकनीक पर निर्भर नहीं होनी चाहिए. इसे हमेशा मज़बूत प्रशासनिक व्यवस्था और मानवीय निगरानी के साथ जोड़ा जाना चाहिए.

यूएन न्यूज़: कई एआई समाधान अभी केवल पायलट स्तर पर हैं. इन्हें राष्ट्रीय या क्षेत्रीय स्तर पर कैसे बढ़ाया जा सकता है?

कमल किशोर: इसके लिए दो चीज़ें बेहद महत्वपूर्ण हैं - नीति एवं रणनीति. सरकारों को यह तय करने के लिए व्यापक योजनाएँ बनानी होंगी कि एआई का उपयोग किस तरह किया जाएगा, विशेषकर प्रदेश स्तर के आपदा प्रबंधन में. हर नई तकनीक के पीछे भागने के बजाय दीर्घकालिक रणनीति ज़रूरी है, ताकि एआई को योजनाओं और कार्यप्रणाली में सही ढंग से शामिल किया जा सके.

पिछले पाँच वर्षों में भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में हुई प्रगति दिखाती है कि समावेशी प्रणालियाँ बड़े पैमाने पर लागू की जा सकती हैं. इसी तरह, एआई के विकास में भी सबकी भागेदारी होनी चाहिए - केवल बड़ी कम्पनियों की नहीं - और इसमें विविध प्रकार के डेटा शामिल होने चाहिए.

यूएन न्यूज़: इस वैश्विक दक्षिण एआई सम्मेलन से आपकी क्या अपेक्षाएँ हैं? एआई और आपदा सहनसक्षमता को लेकर आप नेताओं को क्या सन्देश देना चाहेंगे?

कमल किशोर: मेरी उम्मीद है कि आपदा प्रबंधन के लिए विकसित एआई अनुप्रयोग सभी के लिए सुलभ हों, केवल किसी एक कम्पनी या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहें. निवेश इस तरह हो कि लाभ समाज के हर वर्ग तक पहुँचे, विशेषकर मज़बूत ज़मीनी डिजिटल ढाँचे के माध्यम से.

यूएन न्यूज़: इसमें संयुक्त राष्ट्र की क्या भूमिका होनी चाहिए?

कमल किशोर: संयुक्त राष्ट्र को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो लोग पीछे छूट जाते हैं, उनकी आवाज़ सुनी जाए. हमारा मार्गदर्शक सिद्धान्त है – कोई भी पीछे नहीं छूटे. एआई का विकास समावेशी होना चाहिए. 

साथ ही, संयुक्त राष्ट्र को एआई के दुरुपयोग, जैसेकि ग़लत सूचना या भ्रामक प्रचार के प्रसार, जैसे जोखिमों से निपटने तथा उन्हें रोकने की रणनीतियाँ विकसित करने में नेतृत्व करना चाहिए.

यूएन न्यूज़: अगले पाँच वर्षों में आप एआई और जलवायु के सम्बन्ध को कहाँ देखते हैं?

कमल किशोर: यह एक जटिल मुद्दा है. एक ओर एआई ऐसी तकनीकों के विकास में मदद कर सकती है जो ऊर्जा, बुनियादी ढाँचे और परिवहन प्रणालियों को अधिक कुशल बनाकर खपत कम करें तथा जलवायु परिवर्तन से लड़ने में सहायक हों.

दूसरी ओर, एआई का ढाँचा - जैसेकि डेटा केन्द्र व प्रसंस्करण प्रणालियाँ, स्वयं बहुत अधिक ऊर्जा एवं पानी की माँग करते हैं. इसलिए यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि एआई ऐसा बोझ न बन जाए जो जलवायु संकट को और बढ़ा दे. यह एक जटिल विषय है, जिस पर वैश्विक स्तर पर गम्भीर ध्यान और सावधानीपूर्वक विचार की आवश्यकता है.