समावेशी AI से कृषि में बदलाव सम्भव - IFAD
दुनिया भर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का वजूद और प्रयोग तेज़ी से बढ़ रहा है, लेकिन विकासशील देशों के लिए इसका असली लाभ बड़े मंचों में नहीं, बल्कि ऐसे सरल और उपयोगी साधनों में है जिन्हें किसान आसानी से इस्तेमाल कर सकें. स्थानीय भाषाओं में खेतीबाड़ी के बारे में सलाह, प्रारम्भिक चेतावनी सन्देश और बाज़ार जानकारी जैसे डिजिटल उपकरण, छोटे किसानों के फ़ैसले लेने तथा जोखिम सम्भालने के तरीक़े बदल रहे हैं.
वैश्विक कृषि में AI की भूमिका बढ़ रही है, लेकिन सवाल है कि इसका लाभ किसे मिलेगा. अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) में विकास हेतु सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (ICT4D) की वैश्विक प्रमुख ब्रैंडा गुंडे, यूएन न्यूज़ के साथ बातचीत में बताती हैं कि ये तकनीकें छोटे किसानों की मदद कर सकती हैं, उनके फ़ैसले बेहतर बना सकती हैं और असमानता घटा सकती हैं, बशर्ते कि पहुँच, लागत व बड़े स्तर पर लागू करने से जुड़ी चुनौतियों को दूर किया जाए.
नई दिल्ली में एआई प्रभाव सम्मेलन 2026 के दौरान उन्होंने कहा कि समावेशी नवाचार, स्थानीय स्तर पर जानकारी की उपलब्धता और सरल वितरण व्यवस्था ज़रूरी है, ताकि एआई ग्रामीण जीवन को मज़बूत करे व असमानता नहीं बढ़ाए.
इस साक्षात्कार को स्पष्टता के लिए सम्पादित किया गया है.
यूएन न्यूज़: कृषि क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) को लेकर उत्साह बढ़ रहा है. IFAD के ज़मीनी अनुभव के अनुसार, छोटे स्तर के किसानों के लिए छोटे और व्यावहारिक एआई उपकरण किन क्षेत्रों में वास्तविक लाभ दे रहे हैं?
ब्रैंडा गुंडे: कृषि क्षेत्र बहुत विशाल है और इसमें बहुत सी चुनौतियाँ हैं जिन्हें हल करना ज़रूरी है. हमने यह समझने के लिए अध्ययन किया कि किसान, किन समस्याओं का सामना करते हैं और उन्हें वास्तव में क्या ज़रूरत है, और यह देखा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का व्यावहारिक उपयोग इन समस्याओं को किस तरह सुलझा सकता है.
सबसे पहले जो बात सामने आई, वह थी जानकारी और बाज़ार तक पहुँच. हमने सोचा कि इन समस्याओं को हल करने के लिए एआई, कौन-से सरल और उपयोगी साधन दे सकती है. इसी के तहत हमने एआई का उपयोग कृषि सलाह सेवाएँ देने में किया.
इतनी उन्नत तकनीक होने के बावजूद सवाल यह है कि जानकारी किसानों तक किस तरह पहुँचे. इसलिए हमने स्थानीय भाषाओं में जानकारी पहुँचाने पर ध्यान दिया, क्योंकि किसानों को भरोसे की कमी, स्मार्टफ़ोन की सीमित उपलब्धता और तकनीक तक कम पहुँच जैसी बाधाओं का सामना करना पड़ता है.
कृषि सलाह में एआई का उपयोग जानकारी की असमानता कम करता है. जब किसान सही जानकारी से वंचित होते हैं, तो जिनके पास जानकारी होती है वे अधिक ताक़तवर हो जाते हैं. उदाहरण के लिए, यदि ख़रीदार कोई क़ीमत बताए और किसान को असली बाज़ार भाव नहीं मालूम हो, तो किसान पहले से ही हानिकारक स्थिति में होते हैं.
इसी कारण हम एआई को एक सलाहकार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं, ताकि छोटे किसानों को खेती के बेहतर तरीक़े और बाज़ार तक पहुँच से जुड़ी सही जानकारी मिल सके.
यूएन न्यूज़: जहाँ चरम मौसम की घटनाएँ बढ़ती जा रही हैं, तो हम ऐसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रारम्भिक चेतावनी तंत्र के कितने क़रीब हैं, जो केवल राष्ट्रीय स्तर पर पूर्वानुमान देने के बजाय, गाँव स्तर पर लोगों को फ़ैसले लेने में सहायक हो?
ब्रैंडा गुंडे: हम जितना सोचते हैं, उससे कहीं अधिक क़रीब हैं. असली चुनौती अब जानकारी पहुँचाने की व्यवस्था है. प्रारम्भिक चेतावनी तंत्र जोखिम प्रबंधन में मदद के लिए होते हैं, लेकिन सवाल यह है कि यह सूचना छोटे किसानों तक कैसे पहुँचे ताकि वे तय कर सकें कि बुआई करें, इन्तज़ार करें या सम्भावित बाढ़ की तैयारी करें.
पूर्वानुमान महत्वपूर्ण है, पर उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि जानकारी किसानों तक ऐसे पहुँचे कि वे सही निर्णय ले सकें. उपग्रह डेटा वर्षों से उपलब्ध है, और कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी नई नहीं है. अन्तर ये है कि नई क्षमताओं के कारण अब इसका असर अधिक स्पष्ट दिख रहा है.
जब यह जानकारी सरल रूप में दी जाती है, जैसे छोटे सन्देश, रेडियो प्रसारण या श्रवण सन्देश, तो यह किसानों को जोखिम कम करने, नुक़सान से बचने और बदलती परिस्थितियों के अनुसार ढलने में मदद करती है.
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और पारम्परिक मौसम केन्द्रों के बीच मुख्य अन्तर, डेटा के स्रोत एवं मात्रा का है. मौसम केन्द्र सीमित डेटा पर निर्भर होते हैं, जबकि एआई प्रणालियाँ विशाल डेटा का तेज़ी से विश्लेषण करके, उसे सरल सन्देशों में पहुँचा सकती हैं. इसलिए जितना हम सोचते हैं, उससे अधिक हम ऐसे तंत्र के क़रीब हैं.
यूएन न्यूज़: आपने यह भी कहा कि बड़ी कृषि प्रौद्योगिकी कम्पनियाँ, एआई नवाचार का बड़ा हिस्सा नियंत्रित करती हैं. ऐसे में किस तरह सुनिश्चित किया जाए कि AI कृषि में असमानता न बढ़ाए, जहाँ बड़े कृषि व्यवसाय डेटा व पूंजी के कारण आगे बढ़ें तथा छोटे किसान पीछे न रह जाएँ?
ब्रैंडा गुंडे: जैसा मैंने कहा, असमानता का मुद्दा हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है. हम इसे कई दृष्टिकोणों से देखते हैं - जैसेकि महिलाओं व युवाओं की पहुँच सुनिश्चित करना और जलवायु चुनौतियों का समाधान करना.
यह सच है कि बड़ी तकनीकी कम्पनियों के पास विशाल डेटा होने से उन्हें बढ़त मिलती है. लेकिन हमारा मुख्य सवाल है कि इस अन्तर को किस तरह कम किया जाए. इसका एक अहम तरीक़ा साझेदारी है. कुछ तकनीकी प्रदाता IFAD और अन्य संस्थाओं के साथ मिलकर काम करते हैं, ताकि वे सरकारी प्रणालियों को डेटा दे सकें और सरकारें यह जानकारी छोटे किसानों तक पहुँचा सकें.
यह ज़रूरी है कि जिनके पास संसाधन एवं जानकारी है और जिनके पास नहीं है, उनके बीच की खाई को कम किया जाए. जानकारी की कमी, किसानों की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है. इसलिए यह सुनिश्चित करना बहुत अहम है कि तकनीकी समाधान छोटे किसानों तक ऐसे तरीक़े से पहुँचें, जिन्हें वे सच में उपयोग कर सकें. यही IFAD के काम का मूल उद्देश्य है.
डिजिटल असमानता भी एक बड़ी चुनौती है, जिसे दूर करना आवश्यक है. इसलिए असमानताएँ मौजूद होने के बावजूद, IFAD की ज़िम्मेदारी है कि उसकी परियोजनाएँ इन तकनीकों तक पहुँच बढ़ाएँ और इस अन्तर को कम करने में मदद करें.
यूएन न्यूज़: क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता वैश्विक खाद्य प्रणालियों को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद कर सकती है - जैसेकि अपशिष्ट (Waste) कम करना, पानी का बेहतर उपयोग करना और उत्सर्जन घटाना - या फिर उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं?
ब्रैंडा गुंडे: कृत्रिम बुद्धिमत्ता की ख़ासियत यह है कि यह लगातार विकसित होने वाली तकनीक है और समय के साथ बेहतर होती जाती है. अगर पूछा जाए कि क्या हम इन चुनौतियों का समाधान कर सकते हैं, तो जवाब है हाँ. एक तकनीक विशेषज्ञ के रूप में मैं कहूँगी कि यह सम्भव है. लेकिन क्या हम अभी सभी चुनौतियों का समाधान कर चुके हैं? नहीं. हम अभी बदलाव के दौर में हैं. एआई मॉडल लगातार सीख रहे हैं, नया डेटा ले रहे हैं और नई समझ बना रहे हैं, इसलिए हम अभी विकास के चरण में हैं.
फिर भी भविष्य उज्ज्वल है, क्योंकि तकनीक दक्षता बढ़ाने में मदद करती है. उदाहरण के लिए, अगर किसानों को मालूम हो कि बाज़ार कहाँ है और माँग क्या है, तो वे उसी के अनुसार उत्पादन कर सकते हैं. इससे उन्हें समझ में आता है कि कौन सी फ़सलें उगानी हैं, कहाँ बेचनी हैं, लागत क्या होगी और आय कितनी होगी. वे दूसरों को देखकर खेती करने के बजाय, सोच-समझकर निर्णय ले सकते हैं. कृत्रिम बुद्धिमत्ता ऐसे फ़ैसले आसान बना रही है.
पानी का उदाहरण भी महत्वपूर्ण है. कई देश जल संकट झेल रहे हैं, इसलिए पानी का सही उपयोग ज़रूरी है. तकनीक किसानों को यह तय करने में मदद कर सकती है कि सिंचाई में कितना पानी इस्तेमाल करना है, जैसे खेत में पानी भरना है या बूंद-बूंद सिंचाई अपनानी है. अब किसान ऐसे निर्णय तकनीकी जानकारी के आधार पर ले सकते हैं.
इसलिए भविष्य आशाजनक है, और मैं इसे लेकर उत्साहित हूँ.
यूएन न्यूज़: हम अक्सर बड़े डिजिटल मंचों पर ध्यान देते हैं, लेकिन कीट पहचान ऐप, मिट्टी परीक्षण और उत्पादन पूर्वानुमान जैसे साधारण एआई उपकरण भी जीवन बदल सकते हैं. IFAD, कम लागत वाले और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले ऐसे नवाचारों को किस तरह बढ़ावा दे रहा है?
ब्रैंडा गुंडे: विस्तार क्षमता हमारी सबसे बड़ी प्राथमिकता है. IFAD की कृषि रणनीति ऐसे समाधानों पर केन्द्रित है जो प्रभावी साबित हो चुके हैं और अधिक किसानों तक पहुँच सकते हैं. हम तकनीकों का परीक्षण करते हैं, उन्हें परखते हैं और देखते हैं कि क्या उन्हें बड़े स्तर पर लागू किया जा सकता है. हम उन भागीदारों के साथ भी काम करते हैं जिन्होंने ऐसी तकनीकों को पहले ही आज़माया है और जिन्हें व्यापक स्तर पर लागू करने में मदद मिल सकती है.
हमारे लिए अन्तरिक्ष आधारित निगरानी, प्रारम्भिक चेतावनी उपकरण, बाज़ार मंच और डिजिटल वित्त सेवाएँ मिलकर समाधानों का एक समग्र समूह बनाते हैं, जिनके माध्यम से हम छोटे किसानों तक सेवाएँ पहुँचाते हैं. इसलिए बात केवल शुरुआत की नहीं है, बल्कि इस स्पष्ट दृष्टि की है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य नई तकनीकें, किसानों की चुनौतियों के समाधान में, हमें कितनी दूर तक ले जा सकती हैं.
इस प्रश्न के लिए IFAD का उत्तर है - हाँ, हमारे पास यह दृष्टि है और हम इन तकनीकों की सम्भावनाओं को लेकर उत्साहित हैं. साथ ही हमें यह भी पूरी तरह स्पष्ट है कि हम अभी किस चरण से शुरुआत कर रहे हैं.
यूएन न्यूज़: आपके अनुसार भविष्य में विकास और कृषि के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता की सफलता के क्या मायने होंगे?
ब्रैंडा गुंडे: मेरे लिए सफलता तब है जब असमानता कम हो जाए और हर व्यक्ति तकनीक तक पहुँचकर सही निर्णय ले सके. मैं इसे एक त्रिकोण की तरह देखती हूँ. यदि किसान आय अर्जित कर सकें, सेवाओं तक पहुँच पाएँ और अपना जीवन स्तर सुधार सकें, और साथ ही निजी क्षेत्र भी इस व्यवस्था को समर्थन दे, तो हम मानेंगे कि हम अपना काम ठीक तरह से कर पाए हैं.
अन्ततः, जब तकनीक इन सभी पहलुओं को सक्षम बनाए - किसान लाभान्वित हों, निजी क्षेत्र को भी फ़ायदा हो और लोगों का जीवन बेहतर हो, बिना किसी को पीछे छोड़े - तभी इसे वास्तविक सफलता कहा जाएगा.