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'विकासशील देशों की चुनौतियाँ हल करने में छोटे AI समाधान कारगर'

महेश उत्तमचंदानी, पूर्वी एशिया और प्रशान्त (EAP) तथा दक्षिण एशिया (SAR) क्षेत्रों के लिए डिजिटल और एआई के विश्व बैंक के क्षेत्रीय प्रैक्टिस निदेशक हैं.
© World Bank महेश उत्तमचंदानी, विश्व बैंक में पूर्वी एशिया और प्रशान्त (EAP) तथा दक्षिण एशिया (SAR) क्षेत्रों के लिए डिजिटल व एआई के क्षेत्रीय प्रैक्टिस निदेशक हैं.

'विकासशील देशों की चुनौतियाँ हल करने में छोटे AI समाधान कारगर'

अंशु शर्मा, नई दिल्ली
एसडीजी

विश्व बैंक का कहना है कि विकासशील देशों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) की असली क्रान्ति बड़े और महंगे मॉडलों से नहीं, बल्कि स्थानीय समस्याएँ सुलझाने वाले छोटे और कम लागत वाले उपायों से आएगी.

भारत की राजधानी नई दिल्ली में, बीते सप्ताह आयोजित 'एआई प्रभाव सम्मेलन 2026' आयोजित किया गया है जिसमें संयुक्त राष्ट्र की अनेक एजेंसियों ने शिरकत की. 

विश्व बैंक में पूर्वी एशिया, प्रशान्त और दक्षिण एशिया के लिए डिजिटल एवं कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्रीय प्रैक्टिस निदेशक, महेश उत्तमचंदानी ने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में कहा है कि छोटे और कम लागत वाले AI तंत्र, न केवल किफ़ायती हैं, बल्कि स्थानीय ज]रूरतों के अनुसार आसानी से ढल जाते हैं. 

उन्होंने बताया कि ऐसे समाधान पहले से ही वास्तविक जीवन में महत्वपूर्ण प्रभाव दिखा रहे हैं.

(यह इंटरव्यू स्पष्टता व संक्षिप्तता के लिए सम्पादित किया गया है).

यूएन न्यूज़: हम अक्सर कृत्रिम बुद्धिमत्ता की बड़ी परियोजनाओं पर ध्यान देते हैं, लेकिन बहुत से विकासशील देशों में छोटे AI प्रयोग भी बड़े बदलाव ला रहे हैं. विश्व बैंक महंगी व बड़ी परियोजनाओं की जगह, कम लागत और आसानी से बढ़ाए जा सकने वाले उपायों को कैसे प्राथमिकता दे रहा है?

महेश उत्तमचंदानी: आपकी बात बिल्कुल सही है. दुनिया भर में चर्चा, बड़े और भारी कम्प्यूटर क्षमता वाले एआई मंचों के बारे में होती है, लेकिन बहुत से विकासशील देशों में छोटे और ख़ास काम के लिए बने तंत्र ज्यादा असरदार होते हैं. ये छोटे AI मॉडल सस्ते होते हैं, कम क्षमता वाले उपकरणों के सहारे चल सकते हैं, और स्थानीय भाषाओं, आँकड़ों एवं ज़रूरतों के अनुसार, आसानी से ढल जाते हैं. ये समाधान, सामाजिक सहायता पहुँचाने, फ़सल जाँच, मौसम अनुमान और दफ़्तरी कामकाज जैसे सरकारी कार्यों को आसान करने में, कम लागत पर अधिक फ़ायदा देते हैं.

भारत में, उदाहरण के तौर पर ऐसे विशेष मौसम मंचों ने मानसून के बदलाव पहचाने जिन्हें सामान्य पूर्वानुमान नहीं पकड़ पाए थे. इससे किसानों को पहले चेतावनी मिली. छोटे AI से शुरुआत करना आसान होता है, महँगी कम्प्यूटर व्यवस्था पर निर्भरता घटती है, और देशों की अपनी तकनीकी क्षमता बढ़ती है. यह AI आत्मनिर्भरता के लिए ज़रूरी है. विश्व बैंक, इसलिए देशों को ज़िम्मेदार AI उपायों को आज़माने, जाँचने-परखने और बड़े स्तर पर लागू करने में मदद करता है ताकि विकास पर स्पष्ट असर दिखे.

हमारा सिद्धान्त है. ‘जो समाधान काम करता है उसे खुलकर साझा करें और सफल उपायों को बिना संकोच अपनाएँ’. इसी सोच के साथ हम दूसरे विकास बैंकों के साथ मिलकर, AI उपयोग के उदाहरणों का एक संग्रह बना रहे हैं. इसमें असरदार और बड़े स्तर पर लागू किए जा सकने वाले उपाय होंगे ताकि देश सफल तरीक़ों को अपनाकर आगे बढ़ सकें.

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस को प्रधानमंत्री द्वारा आयोजित रात्रिभोज के दौरान फरवरी 2026 में नई दिल्ली में भारत एआई प्रभाव शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा स्वागत किया गया।
United Nations/Ishan Tankha

यूएन न्यूज़: लेकिन देश, कृत्रिम बुद्धिमत्ता अवसंरचना में निवेश करते समय, क़र्ज़ का बोझ बढ़ने से कैसे बच सकते हैं, विशेषकर तब जब अपेक्षित आर्थिक लाभ समय पर नहीं मिलें?

महेश उत्तमचंदानी: बहुपक्षीय विकास बैंकों को अब यह अधिक ध्यान से सोचना होगा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल ढाँचे के विस्तार के लिए, वित्त किस तरह उपलब्ध कराया जाए. हम, इसी उद्देश्य से ऐसे मिश्रित वित्त मॉडल अपना रहे हैं जिनमें रियायती धन, अनुदान, न्यास कोष, गारंटी और निजी पूंजी शामिल होती है, ताकि सार्वजनिक निवेश का हर डॉलर, अतिरिक्त निजी निवेश को आकर्षित करे.

विश्व बैंक समूह के भीतर यह सहयोग अन्तरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण एवं विकास बैंक (IBRD), एवं अन्तरराष्ट्रीय वित्त निगम (IFC), के बीच तालमेल में दिखता है, जिससे सार्वजनिक धन इस तरह ख़र्च या निवेश किया जाता है कि वह अधिकतम निजी निवेश को प्रेरित करे.

हम विकास बैंकों के बीच संयुक्त वित्त व्यवस्था और प्रक्रियाओं के समन्वय को भी मज़बूत कर रहे हैं. इसका एक उदाहरण पूर्ण पारस्परिक भरोसा ढाँचा है, जिस पर विश्व बैंक समूह के अध्यक्ष अजय बंगा और एशियाई विकास बैंक के अध्यक्ष ने सहमति दी. इसके तहत देश, दोनों संस्थानों से एक ही प्रक्रिया और दस्तावेज़ों के माध्यम से वित्त प्राप्त कर सकते हैं, जिससे लागत घटती है और सहायता तक पहुँच सरल होती है.

नेपाल में इसी ढाँचे के तहत दुनिया का पहला डिजिटल ऋण संचालन हुआ, जिसने दिखाया कि संस्थागत नवाचार से उधार लेने वाले देशों पर प्रक्रियागत बोझ कम किया जा सकता है, और विकास वित्त को अधिक प्रभावी, सुलभ और देश की ज़रूरतों के अनुरूप बनाया जा सकता है.

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© UN India

यूएन न्यूज़: जब उभरती अर्थव्यवस्थाओं में कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रणालियाँ लागू की जाती हैं, तो यह कैसे सुनिश्चित किया जा सकता है कि रोज़गार, कौशल व उद्यमों में मूल्य सृजन, किस तरह स्थानीय स्तर पर ही रहे?

महेश उत्तमचंदानी: हमारी मुख्य प्राथमिकता रोज़गार सृजन है. इसका अर्थ है लोगों की वास्तविक परिस्थितियों को समझना और उनकी विशेष चुनौतियों का समाधान करना. यही दृष्टिकोण स्थानीय ज़रूरतों के अनुरूप स्थानीय समाधान तैयार करने की ओर ले जाता है.

उदाहरण के तौर पर, भारत के एक ग्रामीण क्षेत्र की महिला शिल्पकार पहले केवल अपने गाँव के आसपास के बाज़ार तक ही अपने उत्पाद बेच पाती थी. अब इंटरनैट और डिजिटल मंचों की मदद से, वह देशभर और दुनिया तक ग्राहकों तक पहुँच सकती है. इससे उसकी आय, व्यापार वृद्धि और रोज़गार के अवसर बढ़े हैं. यह सब डिजिटल ढाँचे और भारत की एकीकृत भुगतान प्रणाली जैसे साधनों से सम्भव हुआ है.

उसके ऑनलाइन लेनदेन से एक प्रमाणित आँकड़ा रिकॉर्ड भी बनता है. पहले उसके पास औपचारिक ऋण इतिहास नहीं होता था, लेकिन अब यही डिजिटल रिकॉर्ड उसकी साख़ साबित कर सकता है और उसे पूंजी तक पहुँच दिला सकता है. इस तरह स्थानीय ज़रूरत के अनुरूप बना समाधान, न केवल एक बाधा दूर करता है बल्कि आर्थिक भागेदारी और स्थिरता भी मज़बूत करता है.

यूएन न्यूज़: जैसाकि आपने कहा, छोटे AI उपकरण सूक्ष्म ऋण, शिक्षा सहयोग और जलवायु जैसे कई क्षेत्रों में बदलाव ला सकते हैं. लेकिन यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि ऐसे लक्षित नवाचार, वास्तव में उन्हीं लोगों तक पहुँचें जिनके लिए वे बनाए गए हैं, और उन्हें बिना असमानता बढ़ाए, ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़ाया जाए?

महेश उत्तमचंदानी: हम ऐसे समाधान चाहते हैं जो आगे बढ़ाए जा सकें, दोहराए जा सकें और साथ ही स्थानीय चुनौतियों का समाधान करें. एआई परीक्षण मंच, यानि एक ऐसा सुरक्षित वातावरण जहाँ नई तकनीक को परखा जा सके, हम इस प्रक्रिया में मदद करते हैं क्योंकि वे नवाचारों को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले, जाँचने का अवसर देते हैं. उदाहरण के लिए, विश्व बैंक, तेलंगाना और हरियाणा में ऐसे मंच स्थापित करने के लिए भागीदारों के साथ काम कर रहा है.

AI उपयोग उदाहरणों का संग्रह (AI use-case repository) जैसे साधन भी इस मॉडल को मज़बूत बनाते हैं क्योंकि वे सफल तरीक़ों का रिकॉर्ड रखते हैं और सीख व अनुभव, देशों के बीच साझा करने में मदद करते हैं. कृत्रिम बुद्धिमत्ता विशेष रूप से उन पुरानी विकास चुनौतियों को हल करने में सहायक हो सकती है जिन्हें दूर करना कठिन रहा है, जैसेकि दूरदराज़ क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच और कम सुविधा वाले इलाक़ों में जाँच सेवाएँ बेहतर करना.

यदि AI का प्रयोग ज़िम्मेदारी के साथ किया जाए, तो यह प्रौद्योगिकी इन बाधाओं को बड़े स्तर पर दूर कर सकती है और असमानता बढ़ाने के बजाय उसे कम करने का साधन बन सकती है. लेकिन इसके लिए आधारभूत डिजिटल ढाँचे में निरन्तर निवेश आवश्यक है, ताकि समाधान सबके लिए सुलभ, समावेशी एवं न्यायसंगत बने रहें.

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United Nations/Ishan Tankha

यूएन न्यूज़: कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पादकता बढ़ा सकती है, लेकिन यह विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में कामगारों को विस्थापित भी कर सकती है. क्या इस बदलाव से निपटने के लिए बैंक, कौशल प्रशिक्षण और सामाजिक सुरक्षा में पर्याप्त निवेश कर रहा है?

महेश उत्तमचंदानी: हम कौशल विकास में निवेश कर रहे हैं और सरकारों के साथ मिलकर सामाजिक सुरक्षा प्रणालियों को मज़बूत बना रहे हैं, जिनमें से अनेक को डिजिटल तकनीक की मदद से काफ़ी बेहतर बनाया गया है. डिजिटल साधनों से योजनाएँ, लाभार्थियों तक अधिक तेज़ी और पारदर्शिता के साथ पहुँचती हैं. भारत में महामारी के दौरान इसका उदाहरण देखा गया, जब डिजिटल पहचान और भुगतान मंचों ने बड़े स्तर पर लक्षित सहायता पहुँचाने में मदद की.

कृत्रिम बुद्धिमत्ता श्रम बाज़ार को प्रभावित कर सकती है और सरकारों को, नागरिकों को इसके अनुकूल बनाने में सहायता करनी होगी. फिर भी नए प्रमाण एक सन्तुलित तस्वीर दिखाते हैं. भारत में हाल के अध्ययन बताते हैं कि सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में रोज़गार बढ़ रहा है, जबकि कौशल की माँग अधिक उन्नत डिजिटल एवं विश्लेषणात्मक क्षमताओं की ओर बदल रही है.

विश्व बैंक के विश्लेषण से भी मालूम होता है कि जिन रोज़गारों पर स्वचालन का सबसे अधिक प्रभाव पड़ सकता है, वे सामान्यतः दोहराव वाले प्रशासनिक कार्य होते हैं, जो कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं में विकसित देशों की तुलना में कम पाए जाते हैं. इन तथ्यों से सावधानीपूर्ण आशावाद का संकेत मिलता है. सही कौशल, ढाँचे और समावेशन में निवेश के साथ डिजिटल परिवर्तन व कृत्रिम बुद्धिमत्ता उत्पादकता, अवसर तथा रोज़गार वृद्धि को बढ़ावा दे सकते हैं.