पारम्परिक चिकित्सा: साक्ष्य, मानकों और विज्ञान की ओर बढ़ता एक अहम क़दम
पारम्परिक चिकित्सा पर नई दिल्ली में आयोजित शिखर सम्मेलन के दौरान, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की पारम्परिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा इकाई के प्रमुख डॉक्टर सुंग चोल किम का कहना है कि पारम्परिक चिकित्सा, हर देश की साँस्कृतिक विरासत का हिस्सा है. विश्व स्वास्थ्य संगठन पारम्परिक चिकित्सा को स्वास्थ्य प्रणालियों में सुरक्षित और प्रभावी ढंग से शामिल करने के लिए मज़बूत वैज्ञानिक आधार एवं साझा मानकों की दिशा में काम कर रहा है.
WHO के पारम्परिक चिकित्सा शिखर सम्मेलन के दूसरे दिन चर्चा का केन्द्र “विज्ञान, साक्ष्य और व्यवस्था” रहा. पूर्ण सत्रों और समानांतर बैठकों में ऑस्ट्रेलिया, मोरक्को, ईरान, यूगांडा, कैनेडा, स्विट्ज़रलैंड, संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, कोलम्बिया, ब्राज़ील, भारत, न्यूज़ीलैंड, जर्मनी, नेपाल, कोरिया गणराज्य और श्रीलंका सहित कई देशों के विशेषज्ञों ने पारम्परिक चिकित्सा को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने के लिए अपने अनुभव और दृष्टिकोण साझा किए.
इन सत्रों में यह बात स्पष्ट तौर पर उभरकर सामने आई कि पारम्परिक चिकित्सा को आगे ले जाने के लिए, वैज्ञानिक शोध में निवेश, नवाचार, तरीक़ों में सामंजस्य और अन्तरराष्ट्रीय सहयोग ज़रूरी है, ताकि इसे साक्ष्य-आधारित स्वास्थ्य क्षेत्र के रूप में मज़बूती मिल सके.
साथ ही, शोध के लिए बनाई गई रूपरेखा को वैश्विक कार्रवाई में बदलने, शोध पद्धतियों, सुरक्षा, गुणवत्ता, विनियमन एवं स्वास्थ्य प्रणालियों में सुरक्षित व प्रभावी एकीकरण पर भी गहन चर्चा हुई.
इन्हीं मुद्दों के बीच, यूएन न्यूज़ ने डॉक्टर सुंग चोल किम से बातचीत की, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन में पारम्परिक, पूरक और एकीकृत चिकित्सा इकाई में मानक, विनियमन व एकीकरण से जुड़े कार्यों का नेतृत्व करते हैं.
(इंटरव्यू को स्पष्टता व संक्षिप्तता के लिए सम्पादित किया गया है.)
यूएन न्यूज़: आपकी नज़र में पारम्परिक चिकित्सा क्या है, इसमें क्या-क्या शामिल है और यह इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
डॉक्टर सुंग चोल किम: पारम्परिक चिकित्सा हर देश की साँस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र की अपनी संस्कृति और परम्पराएँ उसकी राष्ट्रीय धरोहर होती हैं. इस लिहाज़ से इसका महत्व परम्परा एवं संस्कृति दोनों के सन्दर्भ में है.
साथ ही, पारम्परिक चिकित्सा की अपनी व्यावहारिक उपयोगिता भी है, क्योंकि इसका दृष्टिकोण जैव-चिकित्सा प्रणाली से अलग है. इसमें रोगों की पहले से ही रोकथाम पर अधिक ज़ोर दिया जाता है, और उपशामक देखभाल तथा उसके उपयोग पर भी विशेष ध्यान रहता है.
यही पारम्परिक चिकित्सा की असली ताक़त है. अब सवाल यह है कि हम पारम्परिक चिकित्सा के इन फ़ायदों को और अधिक स्पष्ट रूप से कैसे सामने लाएँ - ख़ासतौर पर स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच बेहतर बनाने के सन्दर्भ में.
यूएन न्यूज़: तो विश्व स्वास्थ्य संगठन पारम्परिक चिकित्सा को वैश्विक स्वास्थ्य प्रणालियों में जोड़ने के लिए किस तरह काम कर रहा है?
डॉक्टर सुंग चोल किम: विश्व स्वास्थ्य संगठन के पास 1976 से पारम्परिक चिकित्सा का कार्यक्रम है, क्योंकि वह इसके महत्व को मानता है. दुनिया भर में बहुत से लोग पहले से इसका उपयोग करते हैं, इसलिए विश्व स्वास्थ्य संगठन इसे व्यवस्थित ढंग से आगे बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रहा है.
तब से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मानकीकरण और तकनीकी मार्गदर्शन पर ध्यान दिया है. उदाहरण के लिए, पारम्परिक चिकित्सा उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं, जिनमें संस्कृति संग्रहों से जुड़े दिशा-निर्देश भी शामिल हैं. साथ ही शोध के लिए भी मार्गदर्शन बनाया गया है.
हालाँकि कुछ सीमाएँ हैं और समय के साथ इन दिशा-निर्देशों को अद्यतन बनाने (update) की ज़रूरत होगी, लेकिन अब तक की प्रगति महत्वपूर्ण है. इसका एक उदाहरण 2019 और 2022 में अन्तरराष्ट्रीय रोग वर्गीकरण 11 में पारम्परिक चिकित्सा पर अध्याय शामिल करना है, जिसमें अध्याय 1 और अध्याय 2 में पारम्परिक चिकित्सा को शामिल किया गया है. यह पारम्परिक चिकित्सा पर काम आगे बढ़ाने के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन के प्रमुख प्रयासों में से एक है.
यूएन न्यूज़: वैश्विक पारम्परिक चिकित्सा केन्द्र 2022 में स्थापित किया गया था. तब से अब तक कितनी प्रगति हुई है? इसे बनाने का मक़सद क्या था और आगे का दृष्टिकोण क्या है?
डॉक्टर सुंग चोल किम: इस वैश्विक केन्द्र को स्थापित करने का उद्देश्य पारम्परिक चिकित्सा के लिए साक्ष्य आधार को मज़बूत करना था. चूँकि हमारे सामने एक बड़ी चुनौती पारम्परिक चिकित्सा के हस्तक्षेपों के बारे में पर्याप्त साक्ष्यों की कमी है, इसलिए इस साक्ष्य आधार को बेहतर बनाने के लिए यह केन्द्र बनाया गया.
अब इस केन्द्र के तहत शोध प्राथमिकताएँ तय करने और शोध के लिए एक रोडमैप तैयार करने जैसी पहलें एवं परियोजनाएँ चल रही हैं. साथ ही यह भी देखा जा रहा है कि शोध कार्य सिर्फ़ केन्द्र के स्तर पर ही नहीं, बल्कि सदस्य देशों में भी कैसे बढ़ाया जाए. अब तक इन सभी मुद्दों पर काम किया गया है.
मेरा मानना है कि आगे चलकर इन प्रयासों से, पारम्परिक चिकित्सा के लिए अधिक मज़बूत साक्ष्य तैयार करने में निश्चित रूप से प्रगति होगी.
यूएन न्यूज़: जब हम साक्ष्य-आधारित चिकित्सा और पारम्परिक चिकित्सा को मुख्यधारा में लाने की बात करते हैं, तो हमें कई उपचारक और आदिवासी समुदाय भी दिखाई देते हैं, जिनके उपचार के अपने तरीक़े हैं. ख़ासतौर पर साक्ष्य-आधारित एकीकरण के सन्दर्भ में, उन्हें जोड़ने के लिए आपकी क्या योजना है?
डॉक्टर सुंग चोल किम: पारम्परिक चिकित्सा को दो मुख्य श्रेणियों में बाँटा जा सकता है.
पहली श्रेणी है योग्य (qualified, system-based traditional medicine), प्रणाली-आधारित पारम्परिक चिकित्सा - जैसेकि आयुर्वेद, चीनी चिकित्सा, कोरियाई चिकित्सा, जापानी चिकित्सा आदि. ये स्थापित प्रणालियाँ हैं, जिनके पास स्वास्थ्य को समझने, निदान करने और स्थितियों का प्रबंधन करने के अपने सिद्धान्त हैं.
दूसरी श्रेणी है अयोग्य पारम्परिक चिकित्सा (unqualified traditional medicine) - यानि मूलतः आदिवासी चिकित्सा और स्थानीय उपचार पद्धतियाँ. ये अधिकतर स्थानीय लोगों के अनुभव पर आधारित होती हैं. लेकिन ये इतिहास और संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, क्योंकि स्थानीय समुदाय इन पर भरोसा करते हैं और कई वर्षों से इनका उपयोग करते आ रहे हैं.
विश्व स्वास्थ्य संगठन इन पद्धतियों के पीछे छिपे महत्व को देखता है. इस प्रक्रिया में कुछ क़दम ज़रूरी होते हैं - जैसेकि इन अयोग्य पारम्परिक पद्धतियों का आलेखन करना. इसके दौरान हम यह भी देखते हैं कि इन आदिवासी पद्धतियों के भीतर क्या है.
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी नई तकनीकें उभर रही हैं और इससे यह अवसर मिलता है कि उन्नत तकनीक का उपयोग करके हम इन अयोग्य पारम्परिक प्रणालियों के भीतर की बातों को बेहतर ढंग से समझ सकें.
यहीं पर वैश्विक शोध प्राथमिकताएँ और शोध रोडमैप देशों को पारम्परिक चिकित्सा के लिए अधिक मज़बूत व अधिक प्रासंगिक साक्ष्य तैयार करने में मदद कर सकते हैं.
कुछ देशों में ऐसे शिक्षा तंत्र पहले से मौजूद हैं, जहाँ पारम्परिक चिकित्सा और जैव-चिकित्सा प्रणाली, दोनों साथ-साथ पढ़ाई व अभ्यास का हिस्सा हैं. ऐसे सन्दर्भों में एकीकरण आसान हो जाता है, क्योंकि दोनों प्रणालियाँ एक-दूसरे को समझती हैं, और आपसी पहचान व सम्मान भी होता है. ऐसे मामलों में पारम्परिक और जैव-चिकित्सकीय देखभाल कुछ स्थितियों में एक-दूसरे की मदद कर सकती हैं और एक-दूसरे को पूरक भी बन सकती हैं.
लेकिन कई देशों में उचित शिक्षा तंत्र नहीं है. ऐसे में लोग कुछ स्थानीय उपचार पद्धतियों को लेकर सन्देह में रहते हैं. बात यह है कि यदि आपको ठीक-ठीक जानकारी ही नहीं कि कोई चीज़ क्या है, तो आप साक्ष्य का सही तरीक़े से उपयोग करने की स्थिति में नहीं होते.
इसलिए पहला क़दम शिक्षा प्रणालियाँ और टिकाऊ प्रणालियाँ बनाना है, और फिर अधिक साक्ष्य तैयार करना, जिसमें यह भी शामिल हो कि पारम्परिक उपचार एवं पारम्परिक देखभाल का उपयोग कैसे होता है, तथा परिणामों को कैसे मापा जाता है. यह उन सदस्य देशों के लिए यह बेहद अहम है, जो अपनी पारम्परिक पद्धतियों को सत्यापित करने की दिशा में काम कर रहे हैं.
यूएन न्यूज़: तो क्या आपको लगता है कि पारम्परिक चिकित्सा के लिए बनाई गई नई वैश्विक डिजिटल लाइब्रेरी इन सभी प्रयासों में मदद करेगी?
डॉक्टर सुंग चोल किम: मेरा मानना है कि पहला क़दम एक मज़बूत डेटाबेस बनाना है. ऐसी खुली और वैश्विक डिजिटल लाइब्रेरी होने से लोगों को मौजूदा साहित्य और ज्ञान को देखने और उसे अलग–अलग नज़रियों से समझने का अवसर मिलता है - चाहे वह सिद्धान्त के स्तर पर हो, नैदानिक अभ्यास से जुड़ा हो या शोध की सम्भावनाओं के सन्दर्भ में.
इस वैश्विक डिजिटल लाइब्रेरी में विभिन्न प्रकार के ज्ञान को एक साथ लाया और सुरक्षित किया जा सकता है. इससे यह पहचानने में भी मदद मिलती है कि डेटा, नवाचार एवं साक्ष्यों के स्तर पर कहाँ-कहाँ कमी है, और उन कमियों को कैसे पूरा किया जा सकता है.
मेरे विचार में, अन्तरराष्ट्रीय रोग वर्गीकरण के स्तर पर पारम्परिक चिकित्सा से जुड़े अध्याय को शामिल करने का एक मुख्य उद्देश्य यह भी है कि विभिन्न पारम्परिक चिकित्सा प्रणालियों में ज्ञान का मानकीकरण किया जा सके. इससे सदस्य देशों को एक साझा सन्दर्भ एवं समान शब्दावली मिलती है, जिससे वे किसी भी पारम्परिक पद्धति को बेहतर ढंग से समझ सकें, उसकी तुलना कर सकें और उसका सत्यापन कर सकें.
इस तरह, ये सभी पहलें मिलकर भविष्य में पारम्परिक चिकित्सा के लिए अधिक मज़बूत साक्ष्य और मार्गदर्शन तैयार करने की एक ठोस बुनियाद बनाती हैं.
यूएन न्यूज़: पारम्परिक चिकित्सा पर यह दूसरा सम्मेलन है. आप इससे किस तरह के नतीजे और किस तरह की प्रगति देखना चाहते हैं?
डॉक्टर सुंग चोल किम: मेरे विचार से यह वैश्विक शिखर सम्मेलन अलग–अलग हितधारकों की आवाज़ों को एक साथ लाने का एक महत्वपूर्ण मंच है. इसमें नीति-निर्माता और मंत्री शामिल हैं, साथ ही शोधकर्ता, चिकित्सक और शिक्षाविद भी. इन सभी के पास अपने-अपने क्षेत्र का अनुभव एवं विशेषज्ञता है.
यह मंच उन्हें विचारों का आदान–प्रदान करने, एक-दूसरे से सीखने और भविष्य की प्राथमिकताओं को पहचानने का अवसर देता है. इस वैश्विक शिखर सम्मेलन के ज़रिए हम यह बेहतर तरीक़े से तय कर सकते हैं कि पारम्परिक चिकित्सा को आगे बढ़ाने के लिए तात्कालिक, मध्यम और दीर्घकालिक स्तर पर क्या किए जाने की ज़रूरत है.