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केन्या के ‘म्वाज़िन्दिका’ आध्यात्मिक नृत्य दल के सदस्य, नई दिल्ली के लाल किला परिसर में.

यूनेस्को: बदलती दुनिया में जीवन्त विरासत का संरक्षण

© UN News/Rohit Upadhyay
केन्या के ‘म्वाज़िन्दिका’ आध्यात्मिक नृत्य दल के सदस्य, नई दिल्ली के लाल किला परिसर में.

यूनेस्को: बदलती दुनिया में जीवन्त विरासत का संरक्षण

अंशु शर्मा, नई दिल्ली
संस्कृति और शिक्षा

नई दिल्ली के ऐतिहासिक लाल क़िले में आयोजित यूनेस्को की अमूर्त साँस्कृतिक धरोहर (ICH) समिति के 20वें सत्र में इस बार दुनिया भर की जीवित परम्पराओं को अभूतपूर्व संख्या में मान्यता मिली. कुल 78 देशों के 67 सांस्कृतिक तत्व यूनेस्को की सूचियों में जोड़े गए. ये इस कन्वेंशन के इतिहास में किसी एक वर्ष में सबसे अधिक नामांकन हैं.

फ़िलिपीन्स के दूरदराज़ द्वीपों पर हाथ से बनाया गया नमक, केन्या के आध्यात्मिक नृत्य, मोरक्को के काफ़्तान, अफ़ग़ानिस्तान की सूक्ष्म चित्रकला, साइप्रस की हज़ारों साल पुरानी मदिरा (Wine), और बांग्लादेश की टांगाइल साड़ियाँ - इस साल यूनेस्को ने दुनिया भर की ऐसी दर्जनों जीवन्त परम्पराओं को अपनी अमूर्त साँस्कृतिक विरासत की सूचियों में शामिल किया है.

दक्षिण एशिया के लिए यह सत्र ख़ासतौर पर महत्वपूर्ण रहा. भारत की दीपावली को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया. 

श्रीलंका की पारम्परिक किथुल टैपिंग तकनीक, बांग्लादेश की टांगाइल साड़ी बुनाई की कला और पाकिस्तान के सिन्ध-थर क्षेत्र की मिट्टी से बने लोक वाद्य ‘बोरींडो’ को भी वैश्विक पहचान मिली.

इन्हीं फैसलों और उनके व्यापक महत्व को समझने के लिए यूएन न्यूज़ ने नई दिल्ली स्थित यूनेस्को के क्षेत्रीय कार्यालय के निदेशक और यूनेस्को प्रतिनिधि, टिम कर्टिस से बातचीत की. 

टिम कर्टिस, अक्टूबर 2023 में यह ज़िम्मेदारी सम्भालने से पहले, सात साल तक यूनेस्को के 2003 कन्वेंशन के सचिव रहे. इस दौरान उन्हें, तेज़ी से बदलती दुनिया में जीवित विरासत की सुरक्षा पर, समुदायों, सरकारों और विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करने का विशेष अनुभव मिला.

उन्होंने बताया कि ये परम्पराएँ जितनी ख़ूबसूरत हैं, उतनी ही नाज़ुक भी हैं – और इन्हें सहेजकर रखना, अब पहले से भी कहीं अधिक ज़रूरी है.

(साक्षात्कार को संक्षिप्तता व स्पष्टता के लिए सम्पादित किया गया है.)

नई दिल्ली स्थित यूनेस्को के क्षेत्रीय कार्यालय के निदेशक और यूनेस्को प्रतिनिधि, टिम कर्टिस.
© UN News/Rohit Upadhyay

यूएन न्यूज़: इस साल नामांकन की समीक्षा पूरी हो चुकी है. निष्कर्ष क्या रहा?

टिम कर्टिस: इस बार सूची में अब तक की सबसे ज़्यादा प्रविष्टियाँ जोड़ी गईं. 78 देशों की 67 परम्पराएँ शामिल की गईं. इसकी एक वजह यह है कि अमूर्त साँस्कृतिक विरासत राजनैतिक सीमाओं में बँधी नहीं होती. कई परम्पराएँ सदियों से अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित होती रही हैं, इसलिए कई देश संयुक्त नामांकन भेजते हैं. इससे स्पष्ट होता है कि हमारी साँस्कृतिक परम्पराएँ कितनी गहराई से एक-दूसरे से जुड़ी हैं और किस तरह यह कन्वेंशन देशों के बीच सहयोग बढ़ाता है.

यह बैठक बहुत सफल रही. पहली बार समिति की बैठक भारत में हुई है, और दीपावली के सूची में शामिल होने से पूरे देश में उत्सव का माहौल बन गया है.

यूएन न्यूज़: अमूर्त साँस्कृतिक विरासत क्या होती है और इसकी सुरक्षा क्यों ज़रूरी है?

टिम कर्टिस: अमूर्त साँस्कृतिक विरासत, जिसे हम “जीवित विरासत” कहते हैं, वह सबकुछ है जो समुदाय अपनी पहचान व्यक्त करने के लिए करते हैं. इसमें त्योहार, रिवाज़, पकवान परम्पराएँ, प्रकृति से जुड़ा ज्ञान, हस्तशिल्प, और प्रदर्शन कलाएँ शामिल हैं. यह विरासत एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचती है, लेकिन इसके जीवित रहने के लिए ज़रूरी है कि हर पीढ़ी इसे अपने समय के अनुसार ढालती रहे.

इसका संरक्षण इसलिए ज़रूरी है क्योंकि यही परम्पराएँ लोगों को अर्थ, पहचान, जुड़ाव और सहनसक्षमता देती हैं. यह ज्ञान, तेज़ी से बदलती दुनिया में यदि उपेक्षित रहा तो जल्दी खो सकता है. इसे सुरक्षित रखना साँस्कृतिक विविधता को बचाने और दुनिया भर के समुदायों के संचित ज्ञान को बनाए रखने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

ICH सत्र में पनामा प्रतिनिधिमंडल के प्रतिनिधि.
© UNESCO/Paras Mendiratta

यूएन न्यूज़: जब किसी त्योहार या परम्परा को यूनेस्को की सूचियों में शामिल किया जाता है, तो उसका वास्तविक मतलब क्या होता है?

टिम कर्टिस: नामांकन का उद्देश्य अमूर्त साँस्कृतिक विरासत के बारे में जागरूकता बढ़ाना और समुदायों को मान्यता तथा गर्व देना है. यूनेस्को कन्वेंशन के तहत दो मुख्य सूचियाँ हैं - तत्काल संरक्षण सूची, जिसमें वे परम्पराएँ आती हैं जिन्हें अतिरिक्त मदद और ठोस संरक्षण योजनाओं की ज़रूरत होती है, और मानवता की प्रतिनिधि सूची.

कल दीपावली को प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया. हालाँकि दीपावली के लुप्त होने का कोई ख़तरा नहीं है, यह मज़बूत और जीवित परम्परा है. फिर भी नामांकन से समुदाय को पहचान, एकजुटता और साँस्कृतिक सम्मान मिलता है, जो बेहद महत्त्वपूर्ण है.

कम पहचानी जाने वाली परम्पराओं के लिए ऐसी मान्यता, आगे संरक्षण की गतिविधियों में मदद कर सकती है.

विरासत को सुरक्षित रखने की कुंजी है युवा पीढ़ी. परम्पराएँ तभी जीवित रहती हैं जब उनका ज्ञान पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़े. स्कूलों और समाज में इन्हें महत्व नहीं मिले तो यह ज्ञान एक-दो पीढ़ियों में खो सकता है.

इसीलिए औपचारिक मान्यता अहम है. तकनीकी संरक्षण तो समुदाय स्वयं करते हैं - सदियों से करते आए हैं. लेकिन यूनेस्को की सूचियाँ और कार्यक्रम, इन परम्पराओं को दृश्यता, सम्मान और कई मामलों में वित्तीय सहायता भी दिलाते हैं.

कन्वेंशन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि अब वे परम्पराएँ भी “साँस्कृतिक विरासत” के रूप में पहचानी जा रही हैं जिन्हें पहले इस दर्जे का महत्व नहीं दिया जाता था.

अमूर्त साँस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए अंतर-सरकारी समिति का 20वाँ सत्र.
© UNESCO/Paras Mendiratta

यूएन न्यूज़: आपने यूनेस्को के भीतर से इस प्रक्रिया को क़रीब से देखा है. नामांकन की प्रक्रिया पर्दे के पीछे कैसी नज़र आती है?

टिम कर्टिस: नामांकन की प्रक्रिया लम्बी है और इसकी शुरुआत हमेशा समुदाय से होती है. सबसे पहले तो जिस तत्व को प्रस्तावित किया जाता है, उसका आधार समुदाय होना चाहिए. सूची में शामिल करने के लिए पाँच मुख्य मानदंड होते हैं. संक्षेप में - यह अमूर्त साँस्कृतिक विरासत हो, यह लोगों के कल्याण या सतत विकास में योगदान करे, देश ने इसे पहले से राष्ट्रीय स्तर पर किसी सूची में दर्ज किया हो, और सबसे अहम, समुदाय सिर्फ़ सहमति ही न दे, बल्कि सक्रिय रूप से पूरी प्रक्रिया में शामिल हो.

आम प्रक्रिया यह है - समुदाय सरकार से उस तत्व को नामित करने का अनुरोध करता है. देश की सरकार पाँचों मानदंडों के अनुसार फ़ाइल तैयार करके यूनेस्को को भेजती है. यूनेस्को को फ़ाइल मिलने के बाद लगभग 20 महीने का समय लगता है.

पहले यह फ़ाइल एक विशेषज्ञ मूल्यांकन निकाय के पास जाती है, जो देखता है कि सभी मानदंड पूरे हो रहे हैं या नहीं. उसके बाद मामला अंतर-सरकारी समिति के पास आता है, जैसा हम यहाँ देख रहे हैं, जहाँ 24 सदस्य देशों की समिति मूल्यांकन निकाय की सिफ़ारिश के आधार पर अन्तिम निर्णय लेती है.

इस साल समिति में 24 देश सदस्य थे और लगभग 130-140 देश पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित रहे. यह कन्वेंशन अब बहुत लोकप्रिय हो चुका है और यूनेस्को के सबसे तेज़ी से अनुमोदित कन्वेंशनों में से एक है. 

2003 से अब तक लगभग 185 देश इसमें शामिल हो चुके हैं. यह दिखाता है कि अमूर्त साँस्कृतिक विरासत दुनिया भर के समुदायों के लिए कितनी अधिक मायने रखती है.

अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सुरक्षा के लिए अंतर-सरकारी समिति का 20वाँ सत्र.
© UNESCO/Paras Mendiratta

यूएन न्यूज़: तेज़ी से बढ़ते शहरीकरण, प्रवासन और जलवायु परिवर्तन जैसे दबावों के बीच, अमूर्त विरासत की सुरक्षा को प्रासंगिक कैसे रखा जा सकता है?

टिम कर्टिस: सबसे ज़रूरी बात यह है कि समुदाय अपनी परम्पराओं को अब भी मूल्यवान मानें और युवा पीढ़ी को उनमें अर्थ और जुड़ाव महसूस हो. रोज़गार भी बहुत महत्वपूर्ण है. यदि पारम्परिक कलाओं से गुज़ारा नहीं होता, तो युवा उससे दूर हो जाते हैं. इसलिए रचनात्मक उद्योगों से जुड़ी नीतियाँ अहम हैं, ताकि इन परम्पराओं से सम्मानजनक आजीविका भी बन सके.

शिक्षा दूसरा मज़बूत स्तम्भ है. अक्सर ये परम्पराएँ पाठ्यक्रम से बाहर रहती हैं, इसलिए धीरे-धीरे ग़ायब हो जाती हैं. जबकि जब बच्चों को इनके बारे में बताया जाता है, तो उन्हें बहुत अच्छा लगता है. वे स्वाभाविक रूप से इन्हें मज़ेदार, अभिव्यक्तिपूर्ण और अपनी पहचान से जुड़ा हुआ महसूस करते हैं.

यूएन न्यूज़: क्या तकनीक को भी संरक्षण के प्रयासों का हिस्सा होना चाहिए?

टिम कर्टिस: बिल्कुल. लेकिन हमेशा समुदायों की अपनी शर्तों पर. सोशल मीडिया और डिजिटल साधन, युवा पीढ़ी को अपनी विरासत दोबारा खोजने, परम्पराओं को दर्ज करने और कलाकारों व ज्ञानधारकों से जुड़ने में मदद कर सकते हैं. कन्वेंशन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जीवित विरासत हर पीढ़ी की ऐतिहासिक और पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है. तकनीक उसी विकास का हिस्सा है, बशर्ते वह समुदाय को सशक्त बनाए, उसकी जगह न ले.

नई दिल्ली में आयोजित ICH समिति बैठक के दौरान एक विशेष सत्र में, भारत में यूनेस्को के निदेशक टिम कर्टिस.
© UNESCO/Paras Mendiratta

यूएन न्यूज़: क्या आप कोई ऐसा उदाहरण दे सकते हैं जहाँ यूनेस्को सूची में शामिल होने से किसी समुदाय को सीधा लाभ हुआ हो?

टिम कर्टिस: ऐसे कई उदाहरण हैं. भारत में राजस्थान की कालबेलिया नृत्य परम्परा को नामांकन के बाद राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान और सम्मान मिला. इससे समुदाय का आत्मविश्वास बढ़ा और युवा कलाकारों की दिलचस्पी भी बढ़ी.

एक और उदाहरण कूडियाट्टम है, जिसे 2006 में सूची में शामिल किया गया था. उस समय सिर्फ़ दो विद्यालय थे और ज़्यादातर कलाकार उम्रदराज़ थे. जब मैं हाल ही में वहाँ गया, तो मैंने देखा कि अब कई युवा कलाकार यह शास्त्रीय परम्परा सीख रहे हैं और आगे बढ़ा रहे हैं. इसमें लगभग 15 साल लगे, लेकिन अब यह परम्परा फिर से मज़बूती से उठ खड़ी हुई है.