वैश्विक परिप्रेक्ष्य मानव कहानियां
भारत में नई दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यलय में, संयुक्त राष्ट्र के युवा मामलों के सहायक महासचिव डॉक्टर फेलिपे पाउलियर.

'हर स्थानीय क़दम मायने रखता है' – डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर

© UN India/Rohit Karan
भारत में नई दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र कार्यलय में, संयुक्त राष्ट्र के युवा मामलों के सहायक महासचिव डॉक्टर फेलिपे पाउलियर.

'हर स्थानीय क़दम मायने रखता है' – डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर

अंशु शर्मा
एसडीजी

संयुक्त राष्ट्र के युवा मामलों के प्रथम सहायक महासचिव डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर ने अपनी भारत यात्रा के दौरान यूएन न्यूज़ के साथ ख़ास बातचीत में कहा है कि दुनिया भर के युवजन बदलाव की अगुवाई कर रहे हैं और युवाओं को, जलवायु चुनौतियों से निपटने से लेकर डिजिटल भविष्य गढ़ने तक, वैश्विक निर्णय-निर्माण में विश्वसनीय भागीदार बनाया जाना ज़रूरी है.

संयुक्त राष्ट्र के युवा मामलों के सहायक महासचिव डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर अपनी भारत यात्रा के दौरान, 27–29 अक्तूबर को नई दिल्ली में थे.

उन्होंने भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से भेंट की, युवा, शिक्षा, कौशल और विदेश मामलों से जुड़ी उच्च-स्तरीय बैठकों में भाग लिया, और यूएन एजेंसियों, युवा नैटवर्कों व युवा परिवर्तनकारियों के साथ संवाद किया.

उनकी इन मुलाक़ातों में, राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ युवाओं के नवाचार और उद्यमिता पर भी चर्चा हुई. सहायक महासचिव ने, राजस्थान के जयपुर में, यूएन-समर्थित परियोजनाओं का स्थल-निरीक्षण भी किया है.

दिल्ली में उन्होंने यूएन न्यूज़ के साथ एक ख़ास बातचीत में, नीति-निर्माण में युवा सहभागिता, डिजिटल समावेशन, कौशल व रोज़गार-योग्यता, और सतत विकास लक्ष्यों पर सहयोग के बारे में चर्चा की - तथा वैश्विक युवा नेतृत्व में भारत की भूमिका को रेखांकित किया.

(स्पष्टता के लिए इस साक्षात्कार को सम्पादित किया गया है.)

यूएन न्यूज़: आप युवा मामलों के प्रथम सहायक महासचिव हैं. संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के लिए इसके क्या मायने हैं, और यह दुनिया भर के युवजन के लिए कौन-सी नई सम्भावनाएँ खोलता है?

डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर: हाँ, यह नया पद और नया कार्यालय है, लेकिन इसकी बुनियाद एक मज़बूत संस्थागत विरासत पर पड़ी है. संयुक्त राष्ट्र के दो पूर्व युवा दूतों को मैं अपना पूर्ववर्ती मानता हूँ. पद सम्भालने के बाद मेरा पहला क़दम उनसे भेंट करना और उनके अनुभवों से सीखना था. इस कार्यालय की स्थापना संयुक्त राष्ट्र के लिए एक अहम मोड़ है. इसने युवाओं को हाशिये से उठाकर संगठन के एजेंडा के केन्द्र में रखा है.

यह केवल संस्थागत निर्णय नहीं है. यह वर्षों की सामूहिक पैरोकारी का परिणाम है - युवा - नेतृत्व वाले और युवा-सेवा संगठनों के प्रयासों का, और स्वयं युवाओं का, जिन्होंने प्रणाली में अधिक मान्यता के लिए संघर्ष किया है.

इस कार्यालय का उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र को युवाओं के लिए, उनके साथ मिलकर बेहतर साझीदार बनाना है. ताकि वे महसूस करें कि यह संगठन सचमुच उनका है, व संयुक्त राष्ट्र उन पर भरोसा करता है तथा उनके योगदान को महत्व देता है.

आगे की सम्भावनाएँ बहुत व्यापक हैं. चूँकि इस कार्यालय की स्थापना महासभा ने की है, इसे सभी सदस्य देशों का औपचारिक समर्थन मिला है. असली चुनौती और अवसर यह है कि सरकारों, संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों और दुनिया भर के युवा आंदोलनों के प्रयासों को जोड़कर, हम इस एजेंडा को मिलकर आगे बढ़ाएँ -. युवाओं से जुड़े मुद्दे संयुक्त राष्ट्र के हर क्षेत्र में फैले हैं. सफलता तभी सम्भव है जब युवजन व उनके संगठनों को भविष्य गढ़ने में सक्रिय साझीदार के रूप में सक्षम बनाया जाए.

भारत में संयुक्त राष्ट्र के रैज़िडेन्ट कोऑर्डिनेटर, शॉम्बी शार्प के साथ, संयुक्त राष्ट्र के युवा मामलों के सहायक महासचिव डॉक्टर फेलिपे पाउलियर.
© UN India/Shachi Chaturvedi

यूएन न्यूज़: वर्तमान पीढ़ी कई वैश्विक झटकों का सामना कर रही है - संघर्ष, असमानता, जलवायु संकट और डिजिटल बदलाव. ऐसे समय में युवजन, बहुपक्षवाद और वैश्विक सहयोग की अवधारणा को किस तरह नए सिरे से परिभाषित कर सकते हैं?

डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर: सबसे पहला और सबसे अहम परिवर्तन हमारी अपनी संस्थाओं के भीतर से शुरू होना चाहिए. हमें ऐसे वास्तविक मंच बनाने होंगे जहाँ युवा अपने विचार साझा कर सकें और अपनी क्षमताओं का उपयोग कर सकें. उन्हें बाद में शामिल करने योग्य किसी विषय की तरह नहीं, बल्कि निर्णय-निर्माण प्रक्रिया के अभिन्न हिस्से के रूप में देखा जाए. युवा कार्यालय की स्थापना इस दिशा में एक अहम क़दम है, लेकिन लक्ष्य इससे कहीं आगे है - बहुपक्षवाद को भीतर से संरचनात्मक रूप से बदलना, ताकि युवाओं की भागेदारी उसकी मूल संरचना का हिस्सा बन सके.

इसके लिए एक गहरा सांस्कृतिक परिवर्तन भी आवश्यक है. हमें युवाओं को समस्या के रूप में देखने की पुरानी सोच से बाहर निकलकर उन्हें वही मानना होगा जो वे हैं - परिवर्तन के अग्रदूत. वे तकनीकी नवाचार से बदलाव ला रहे हैं, स्वास्थ्य और शिक्षा की पहलों से समुदायों को नया रूप दे रहे हैं, और समाज में ज़मीनी स्तर के बदलाव का नेतृत्व कर रहे हैं. संयुक्त राष्ट्र की युवा रणनीति का मूल यही है - युवाओं पर विश्वास करना, उन्हें सशक्त बनाना, और उन्हें दुनिया के भविष्य को आकार देने की प्रक्रिया में अर्थपूर्ण रूप से शामिल करना.

यूएन न्यूज़: “युवाओं की सार्थक भागेदारी” संयुक्त राष्ट्र की चर्चाओं में अक्सर सुनाई देने वाला वाक्य है. ज़मीनी स्तर पर यह कैसी नज़र आती है – ख़ासतौर पर भारत जैसे देशों में, जहाँ विशाल युवा आबादी है?

डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर: भारत दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है, और यह स्थिति उस व्यापक वैश्विक वास्तविकता को दर्शाती है जहाँ लगभग आधी मानवता, 30 वर्ष से कम उम्र की है और अधिकाँश युवा विकासशील देशों में रहते हैं. इसका मतलब है कि वैश्विक या विकास से जुड़ी किसी भी चुनौती का समाधान, युवाओं को शामिल किए बिना सम्भव नहीं है. इसलिए समावेशन कोई विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता है.

आज की चुनौतियाँ एक-दूसरे से गहराई के साथ जुड़ी हैं - जलवायु परिवर्तन, असमानता और डिजिटल परिवर्तन. इनसे निपटने के लिए युवाओं की रचनात्मकता और तकनीकी दक्षता अत्यंत महत्वपूर्ण है. हमें नेतृत्व स्तर पर मज़बूत प्रतिबद्धताएँ चाहिए. साथ ही ऐसे ढाँचे भी बनाने होंगे जो हर स्तर पर युवाओं की सार्थक भागेदारी सुनिश्चित करें - ख़ासतौर पर ज़मीनी स्तर पर, जहाँ लोग सीधे इन समस्याओं का सामना करते हैं.

सच्ची युवा भागेदारी एक बार का परामर्श नहीं, बल्कि एक निरन्तर चक्र है. यह हर चरण में होनी चाहिए - जब नीतियाँ बनाई जा रही हों, जब उन्हें लागू किया जा रहा हो, और जब उनका मूल्यांकन हो रहा हो. यही दृष्टिकोण संयुक्त राष्ट्र की युवा रणनीति के केन्द्र में है - पूरी यूएन प्रणाली की क्षमता बढ़ाकर युवजन की भागेदारी को वास्तविक, स्थाई और प्रभावशाली बनाना.

यूएन न्यूज़: कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), डिजिटल मंचों और दूरस्थ कामकाज (Remote working) जैसे तकनीकी बदलावों के बीच, आप कैसे देखते हैं कि ये प्रगति युवाओं की भागेदारी को नया रूप दे रही हैं? संयुक्त राष्ट्र किस तरह सुनिश्चित कर सकता है कि ये तकनीकें समावेशी हों और युवाओं को अलग-थलग करने का नया कारण नहीं बन जाएँ?

डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर: तकनीक एक असाधारण अवसर भी है और एक बड़ी चुनौती भी. यह जुड़ाव और नवाचार के नए रास्ते खोलती है, लेकिन गहरे संरचनात्मक अवरोध अब भी मौजूद हैं. बहुत से युवा आज भी डिजिटल विभाजन और इंटरनैट सम्पर्क की कमी के कारण पीछे रह जाते हैं. इस अन्तर को पाटना एक वैश्विक प्राथमिकता होना चाहिए.

उतना ही महत्वपूर्ण मुद्दा सुरक्षा का है, ख़ासतौर डिजिटल मंचों पर युवतियों और युवा महिलाओं के लिए. जैसे-जैसे तकनीक विकसित हो रही है, हमारी संस्थाओं को भी विकसित होना होगा - केवल संवाद के तरीक़ो में नहीं, बल्कि सहभागिता के स्वरूप में भी. हमें एकतरफ़ा संचार से आगे बढ़कर वास्तविक, दो-तरफ़ा सहभागिता की ओर जाना होगा.

संयुक्त राष्ट्र भी इन परिवर्तनों के साथ सीख रहा है और विकसित हो रहा है. हम साझीदारों और सामुदायिक नेताओं के साथ मिलकर डिजिटल भागेदारी को समावेशी, सुरक्षित और सुलभ बनाने के लिए काम कर रहे हैं. क्योंकि युवा डिजिटल दुनिया के मूल निवासी हैं, इसलिए संयुक्त राष्ट्र को वहीं जाना होगा जहाँ वे हैं - ऐसे ऑनलाइन मंचों पर जो उनकी वास्तविकताओं, रचनात्मकता और आवाज़ों को प्रतिबिंबित करते हैं. इसी तरह डिजिटल युग में युवाओं की सार्थक भागेदारी सचमुच फल-फूल सकती है.

भारत यात्रा के दौरान, यूएन की देशीय टीम के प्रतिनिधियों के साथ एक बैठक में, संयुक्त राष्ट्र के युवा मामलों के सहायक महासचिव डॉक्टर फेलिपे पाउलियर.
© UN India/Shachi Chaturvedi

यूएन न्यूज़: आप भारत और उसके युवाओं की वैश्विक प्राथमिकताओं में क्या भूमिका देखते हैं? वे इस दिशा में किस प्रकार योगदान दे सकते हैं?

डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर: मुझे लगता है कि यह प्रक्रिया पहले से ही शुरू हो चुकी है. हालाँकि भारत का यह मेरा पहला दौरा है, लेकिन मुझे देश के अलग-अलग हिस्सों से आए अनेक प्रेरणादायक युवाओं से मिलने का अवसर मिला है. वे अपने समुदायों से गहराई से जुड़े हैं, अपनी विरासत पर गर्व करते हैं और अपनी आवाज़ को प्रभावशाली ढंग से सामने लाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

भारत की ताक़त केवल उसकी आबादी में नहीं, बल्कि उसके अदभुत नवाचार और नागरिक ऊर्जा के पारिस्थितिकी तंत्र में भी है. संयुक्त राष्ट्र और भारत सरकार मिलकर ऐसे मंच बना रहे हैं जहाँ युवा खुलकर अपनी बात रख सकें और राष्ट्रीय व वैश्विक प्राथमिकताओं में योगदान दे सकें. अब ज़रूरत है कि इस प्रयास को और आगे बढ़ाया जाए. अवसरों को और व्यापक बनाया जाए ताकि वे हर क्षेत्र और हर पृष्ठभूमि के युवाओं तक पहुँचें.

भारतीय युवाओं से सीखने के लिए बहुत कुछ है, और वे वैश्विक विमर्श में बेहद मूल्यवान योगदान दे सकते हैं. भारत संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य है और लम्बे समय से बहुपक्षवाद का समर्थक रहा है. भविष्य में संयुक्त राष्ट्र की दिशा तय करने में उसकी भूमिका अहम होगी.

जब संयुक्त राष्ट्र अपनी 80वीं वर्षगाँठ मना रहा है, तब दुनिया को भारत के युवाओं, उनके विचारों और उनके नेतृत्व की पहले से अधिक आवश्यकता है. इसी नेतृत्व से हम मिलकर सतत विकास और वैश्विक सहयोग के अपने साझा लक्ष्यों को आगे बढ़ा सकते हैं.

यूएन न्यूज़: यदि आप किसी ऐसे युवा से सीधे बात कर सकते हों जो दुनिया में कहीं भी ख़ुद को असहाय या अनसुना महसूस करते हैं तो आप क्या कहेंगे?

डॉक्टर फ़ेलिपे पाउलियर: संयुक्त राष्ट्र में हम उन्हें देख रहे हैं. हमें हर जगह ऐसे युवा परिवर्तनकारी नज़र आते हैं - नवोन्मेषक, सामुदायिक नेता और समस्या-समाधानकर्ता - जो पहले से ही अपने आसपास की दुनिया को आकार दे रहे हैं. हमारी प्रतिबद्धता है कि हम उनके साथ अपनी साझेदारी को और मज़बूत बनाएँ, युवाओं को अपने काम के केन्द्र में रखें और यह सुनिश्चित करें कि संयुक्त राष्ट्र उनके विचारों और पहलों के लिए एक सशक्त मंच बने.

वैश्विक चुनौतियाँ अक्सर भारी लग सकती हैं, लेकिन हर व्यक्ति के पास अपना एक “प्रभाव का दायरा” होता है - वह क्षेत्र जहाँ वह बदलाव ला सकता है. यह स्कूल, संगठन, समुदाय या अपने परिवार के भीतर भी हो सकता है. छोटा हो या बड़ा, हर योगदान मायने रखता है. हर स्थानीय कार्रवाई महत्वपूर्ण है, क्योंकि यही सामूहिक स्थानीय प्रयास अन्ततः वैश्विक प्रगति को आगे बढ़ाते हैं.

आज मैंने भारत के अलग-अलग हिस्सों से आए प्रेरणादायक युवजन से मुलाक़ात की. वे अपनी-अपनी जगह पर परिवर्तन का नेतृत्व कर रहे हैं. उनका काम साबित करता है कि वैश्विक बदलाव की शुरुआत स्थानीय स्तर से होती है. दुनिया भर के युवाओं के लिए मेरा सरल संदेश है: जब चुनौतियाँ बड़ी लगें, तब भी उसी पर ध्यान दें जिसे आप बदल सकते हैं. गिलास के भरे हिस्से पर नज़र रखें, क्योंकि उम्मीद और निरंतरता ही छोटे क़दमों को वैश्विक असर में बदलती हैं.