यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, निजेर की यात्रा के दौरान.

इण्टरव्यू: यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट के साथ विदाई बातचीत

© OHCHR/Anthony Headley
यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, निजेर की यात्रा के दौरान.

इण्टरव्यू: यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट के साथ विदाई बातचीत

मानवाधिकार

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, इस पद पर चार साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद अगस्त में, इस ज़िम्मेदारी को अलविदा कह रही हैं. उन्होंने यूएन न्यूज़ के साथ अपने विदाई साक्षात्कार में कहा है कि उन्होंने हमेशा ही अपनी बात किसी भी डर के बिना रखी है. मगर उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि ये ज़िम्मेदारी, देशों को स्वतंत्रताओं को सीमित करने से रोकने के लिये, लगातार चुनौतियों से भरी हुई है.

बुधवार, 31 अगस्त को औपचारिक रूप से अपना कार्यकाल पूरी कर रही, मिशेल बाशेलेट, चिले की दो बार राष्ट्रपति रह चुकी हैं और यूएन वीमैन संस्था की भी प्रमुख रह चुकी हैं. उन्होंने यूएन मानवाधिकार कार्यालय की अध्यक्ष के रूप में अपने चार साल के कार्यकाल पर फिर से नज़र डाली और कहा कि दुनिया के कुछ क्षेत्रों में मानवाधिकारों की स्थिति पीछे की तरफ़ गई है, जबकि कुछ अन्य क्षेत्रों में कुछ महत्वपूर्ण क़दम भी रहे हैं.

उनका कहना है, “जैसाकि जीवन में होता है, कुछ अच्छे पल तो कुछ कठिन लम्हे भी होते हैं, और हमें उन सभी के साथ काम करना होता है.” उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें इस शीर्ष मानवाधिकार पद पर कभी भी चुप रहने के लिये विवश नहीं किया गया.

“मैंने हमेशा ही अपनी बात कहने या नहीं कहने के लिये मुक्त महसूस किया है, जो भी मेरे लिये करना ज़रूरी था.”

उनकी हाल की चीन यात्रा पर प्रस्तावित रिपोर्ट के बारे में मिशेल बाशेलेट का कहना था कि उन्होंने चीन के अधिकारियों के सामने अपनी बात बेबाकी से रख दी है. पिछले 17 साल में किसी यूएन मानवाधिकार प्रमुख की ये पहली चीन यात्रा थी.

उन्होंने यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय के संचालन को अक्सर विरोधाभासी कार्य भी क़रार दिया जिसमें निर्बल जन की आवाज़ बनने और सहानुभूतिहीन सदस्य देशों के साथ, उन्हें सलाह और विशेषज्ञता उपलब्ध कराने व निगरानी और रिपोर्टिंग के लिये, उच्चतम कूटनैतिक स्तर पर सम्पर्क क़ायम रखना, दोनों ही शामिल हैं.

उन्होंने यूएन न्यूज़ को बताया कि उनके पास अपने उत्तराधिकारी को व्यापक सलाह देने के लिये तत्पर रहेंगी.

मानवाधिकारों के लिये यूएन उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के साथ एक वर्चुअल बैठक में हिस्सा लिया.
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मानवाधिकारों के लिये यूएन उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग के साथ एक वर्चुअल बैठक में हिस्सा लिया.

यूएन न्यूज़: मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, यूएन न्यूज़ के साथ इस साक्षात्कार के लिये धन्यवाद! चार साल पहले जब आपने कार्यभार सम्भाला था, तो यूएन न्यूज़ के साथ एक इंटरव्यू में कहा था कि मानवाधिकारों की रक्षा, एक ऐसा कार्य है जो कभी ख़त्म नहीं होता. आपने क्या प्रमुख कार्रवाई की और कौन से ऐसे मुद्दे हैं जो अभी हल नहीं हो पाए?

मिशेल बाशेलेट: चार साल पहले मैंने जो कहा था, वो मुझे फिर दोहराना होगा. यह एक ऐसा कार्य है जो कभी समाप्त नहीं होता. ऐसी शायद बहुत सी चीजें हैं जो हम हासिल नहीं कर पाए, क्योंकि सब कुछ कर पाना सम्भव नहीं है. लेकिन उदाहरण स्वरूप, हम नागरिक समाज व अन्य एजेंसियों के साथ, कुछ महत्वपूर्ण क़दम उठाने में सफल हुए हैं. जैसेकि, महासभा का वो निर्णय कि स्वस्थ पर्यावरण का अधिकार एक मानव अधिकार है - और प्रदूषण के ख़िलाफ़ लड़ाई आदि.

मेरा मानना है कि मानवता के लिये बदतरीन जोखिम, तिहरे पृथ्वी ग्रह के संकटों से है; जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और जैव-विविधता की हानि.

यह नागरिक समाज के लिये एक लम्बी लड़ाई थी, लेकिन बाद में हमने और WHO ने एक मज़बूत साझेदारी के तहत उसे आगे बढ़ाया. और फिर मानवाधिकार परिषद का प्रस्ताव जब महासभा में गया और वह मज़बूत बहुमत से अनुमोदित हुआ, तो इससे स्पष्ट है कि यह वास्तव में बेहद महत्वपूर्ण था.

इसलिये यदि सदस्य देश, पेरिस समझौते के तहत इस पर अमल करते हैं, तो मुझे लगता है कि यह वास्तव में एक महत्वपूर्ण क़दम होगा.

लेकिन हमें कुछ अन्य सफलताएँ भी मिलीं. मैं कहूंगी कि हमने मृत्युदण्ड (Death Penalty) को समाप्त करने की दिशा में कुछ रुझान देखे हैं. 170 से अधिक देशों ने इसे, या तो पहले ही ख़त्म कर दिया है, या मृत्युदण्ड पर रोक लगा दी है और कई अन्य देशों ने घोषणा की है कि वे भी उसी रास्ते पर चलने के लिये तैयार हैं. मुझे लगता है कि यह भी अच्छी ख़बर है.

हम कुछ जगहों पर, आम लोगों की मदद करने में सक्षम रहे हैं, इसलिये उनकी आवाज़ सुनी जा रही है. वहाँ मानवाधिकारों, महिला अधिकारों या बाल अधिकारों की रक्षा के मामलों में क़ानूनों में बेहतरी के लिये बदलाव आए हैं.

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) के बूनिया की यात्रा के दौरान.
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यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, काँगो लोकतांत्रिक गणराज्य (DRC) के बूनिया की यात्रा के दौरान.

साथ ही मैं यह भी कहूंगी कि हम मानवाधिकार रक्षकों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहे हैं.

हम अन्य एजेंसियों और लातीनी अमेरिका व कैरीबियाई क्षेत्र के लिये संयुक्त राष्ट्र आयोग - ECLAC के साथ मिलकर, लातीनी अमेरिका में Escazú समझौते का समर्थन कर रहे हैं. यह पहला समझौता है, जो जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में लोगों की भागेदारी के महत्व के बारे में जानकारी लेने के अलावा, स्थानीय समुदाय के रक्षकों या भूमि रक्षकों जैसे पर्यावरण रक्षकों की रक्षा को भी महत्व देता है. तो इस तरह की बहुत सी छोटी-बड़ी चीज़ें हैं, जो विशिष्ट क़ानूनों में बदलाव लाते समय या कुछ विधेयकों को पारित होने से रोकने के लिये, नागरिक समाज का समर्थन करने वाली सरकार के साथ चर्चा करने में अहम होते हैं, क्योंकि ये ग़लत दिशा में जा सकते हैं.

लेकिन यह एक ऐसा काम है जिसमें बड़े लक्ष्यों के साथ-साथ मध्यम और छोटे लक्ष्य भी होने ज़रूरी होते हैं, क्योंकि आपको बहुत सारे क्षेत्रों में अलग-अलग काम करने होते हैं. इसलिये, हमें काम करना जारी रखना होगा. अगर कोई उच्चायुक्त कहते हैं कि सब कुछ हो गया है, तो मैं यही कहूँगी कि यह हक़ीकत नहीं है.

यूएन न्यूज़: इन चार वर्षों में, मानवाधिकार सिद्धान्तों की कठिन परीक्षा हुई है. एक अभूतपूर्व महामारी से लेकर नए, अप्रत्याशित युद्धों और महिलाओं के अधिकारों पर हमले, सैन्य तख़्तापलट और नई तानाशाही तक. क्या आपको लगता है कि सार्वभौमिक मानवाधिकारों पर प्रगति पीछे होती जा रही है? या फिर उलट गई है?

मिशेल बाशेलेट: आप सही कह रहे हैं कि पिछले चार वर्षों में दुनिया नाटकीय रूप से बदल गई है. आपने पहले ही महामारी, और जलवायु परिवर्तन के बढ़ते असर का उल्लेख किया है. और अब हम यूक्रेन में युद्ध के परिणाम स्वरूप भोजन, ईंधन और वित्त संकट के दूर तक महसूस होने वाले झटके देख रहे हैं.

हमने अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भारी ध्रुवीकरण देखा है, और हमने म्याँमार व बुर्कीना फासो, गिनी व माली में विरोध आन्दोलनों एवं तख़्तापलट भी देखे हैं, और अफ़ग़ानिस्तान में तालेबान के क़ब्ज़े के भी साक्षी रहे हैं.

और इसलिये मैं कहूंगी कि यह सब केवल एक दिशा में नहीं जाता, क्योंकि हाँ, एक तरफ़ तो बहुत सारी चीज़ें ग़लत दिशा में जाती दिख रही हैं और वो मानवाधिकारों के ख़िलाफ़ हैं.

साथ ही, कोविड-19 महामारी के दौरान कुछ देशों ने स्वास्थ्य के कारण आवश्यक प्रतिबन्ध लगाए, लेकिन प्रैस की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबन्दी लगाना, महामारी से निपटने के लिये ज़रूरी नहीं था. लेकिन दूसरी ओर, इसे पलटा जा सकता है - एक तरफ़ तो, हम इसे हल्का नहीं मान सकते क्योंकि किसी ने सोचा नहीं था कि योरोप एक नए युद्ध का सामना करेगा, लेकिन ऐसा हुआ है और दूसरी ओर, हमने सोचा था कि मानवाधिकार तो सभी का हक़ हैं,  लेकिन असल में ऐसा नहीं है. हमने देखा कि जो देश हमेशा मानवाधिकारों की बात करते हैं, ज़रूरी नहीं कि वे हमेशा उनका सम्मान भी करें.

मैं कहूंगी कि यह न केवल जागरूक होने के लिये एक निरन्तर एवं स्थाई संघर्ष है, बल्कि सदस्य देशों को अपनी ज़िम्मेदारी निभाना जारी रखने, और नागरिक समाज का समर्थन करने के लिये भी ज़रूरी है. आपने बहुत सारे महत्वपूर्ण आन्दोलन देखे हैं, ग्रह के लिये युवाओं का प्रदर्शन, महिलाओं का, ‘मी टू’ अभियान ... या, ‘ब्लैक लाइव्स मैटर.’ ये सभी प्रदर्शन, प्रणालीगत नस्लवाद को रोकने के लिये हैं. इसलिये, मैं कहूंगी कि कुछ क्षेत्रों में हालात पलटे हैं, लेकिन दूसरी ओर, अन्य क्षेत्रों में महत्वपूर्ण क़दम उठाए गए हैं. तो जीवन में हमेशा की तरह, आपके पास कुछ अच्छे क्षण व कुछ कठिन क्षण होते हैं, और आपको दोनों के साथ काम करना है.

यूएन न्यूज़: तो, कठिन क्षणों की बात करें तो आपके लिये, मानवाधिकार कार्यालय के प्रभारी के लिये व्यक्तिगत रूप से, सबसे कठिन क्षण कौन से रहे हैं?

मिशेल बाशेलेट: विभिन्न प्रकार के मुद्दे होते हैं. कभी-कभी आपको भयानक व्यक्तिगत मामलों से निपटना पड़ता है, जो वास्तव में आपको बहुत प्रभावित करते हैं. जब आप किसी स्थान पर जाते हैं और लोगों की पीड़ा देखते हैं – जैसेकि मैं कुछ ही दिन पहले कॉक्सेस बाज़ार के रोहिंज्या शरणार्थियों से बात करके वापस आई हूँ. उन्होंने हमसे, संयुक्त राष्ट्र से, उनकी म्याँमार वापसी सुनिश्चित करने का आग्रह किया. लेकिन हम अभी यह सुनिश्चित करने में सक्षम नहीं हैं, क्योंकि स्थिति सही नहीं है, इसलिये सुरक्षित तरीक़े से म्याँमार वापिस जाना सम्भव नहीं है.

लेकिन दूसरी ओर, आप देखते हैं कि वहाँ के लोग ऊर्जा से भरपूर व उत्साहित हैं - अपने देश वापस जाने के इच्छुक हैं. लेकिन हमारे सामने सबसे मुश्किल मुद्दों में से एक कोविड-19 महामारी थी, न केवल दुनिया में बल्कि OHCHR के लिये भी,  क्योंकि इसका मतलब था कि हालात बिल्कुल बदल गए थे.

हमें ख़ुद को नई परिस्थितियों के अनुकूल ढालना, अलग-अलग परिस्थितियों में रहना सीखना था. तालाबन्दी, अलगाव में रहना, बहुत से लोगों के लिये, छोटे बच्चों के साथ रहने वाले हमारे सहयोगियों के लिये भी, वास्तव में कठिन था. दूसरी ओर, हमें टीकों तक पहुँच, उपचार तक पहुँच के मामले में असमानता से भी निपटना पड़ा.

जिस तरह कोविड-19 ने दुनिया की सभी असमानताओं को उजागर कर दिया, इसने इतना स्पष्ट कर दिया कि महामारी से उबरने के बाद, हमारा लक्ष्य पूर्व स्थिति में वापस नहीं जाना था, क्योंकि वह सामान्य स्थिति बहुत ख़राब थी. वह स्थिति ही हमें इन हालात में ले आई थी, लेकिन इससे हमें यह चर्चा करने का अवसर भी मिला कि हम भविष्य के लिये क्या चाहते हैं? इसी से हमने "बेहतर पुर्नबहाली" के बारे में बात करना शुरू किया, लेकिन अब हम इसे बदलकर "भविष्य में बेहतर पुनर्निर्माण" कर रहे हैं. तो, समस्याएँ अपने साथ अवसर भी लेकर आती हैं.

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) मिशेल बाशेलेट, बुर्कीना फ़ासो की यात्रा के दौरान.
© OHCHR/Anthony Headley
यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त (OHCHR) मिशेल बाशेलेट, बुर्कीना फ़ासो की यात्रा के दौरान.

यूएन न्यूज़: यदि आपको चुनना पड़े, तो वह कौन सा क्षण होगा, जहाँ आपको मानवाधिकार उच्चायुक्त होने पर अधिक गर्व महसूस हुआ?

मिशेल बाशेलेट: कभी-कभी छोटी सी जीत भी आपको बहुत ख़ुश कर जाती है, और कभी-कभी जलवायु परिवर्तन जैसे बड़े मुद्दे वास्तव में महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि आप मानवता के ख़िलाफ़ सबसे बड़े ख़तरे से निपटने की दिशा में एक बड़ा क़दम उठा रहे हैं.

यूएन न्यूज़: आपसे पहले मानवाधिकार उच्चायुक्त के पद पर रहे, ज़ायद राआद अल हुसैन ने अपने कार्यकाल के अन्त में कहा था कि अन्याय का सामना करने के लिये चुप रहने की तुलना में, ग़लत होना और आवाज़ उठाना बेहतर है. क्या आपको कभी-कभी चुप रहना पड़ा है या आपने हमेशा अपने मन की बात कहने के लिये स्वतंत्र महसूस किया है? क्या आपको कभी किसी तरह का समझौता करना पड़ा है?

मिशेल बाशेलेट: मैं सबसे पहले, संयुक्त राष्ट्र की अवर-महासचिव हूँ, इसलिये जब भी मैं बोलती हूँ, तो संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त के रूप में बोलती हूँ. इसलिये मैं हमेशा बोलने के लिये स्वतंत्र हूँ. लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से नहीं बोलती, केवल संयुक्त राष्ट्र के रूप में ही बोलती हूँ.

अगर आप केवल एक नागरिक या एनजीओ हैं तो यह अलग बात है. तब हो सकता है कि आपको बोलने का अलग तरीक़ा अपनाना पड़े, क्योंकि हो सकता है कि आपके उद्देश्य अन्य संस्थाओं से मेल ना खाएँ. लेकिन मैंने जो सोचा, या जो भी अहम समझा, वो बोलने के लिये हमेशा स्वतंत्र महसूस किया है.

ग़लतियाँ सभी से हो सकती हैं, लेकिन मुख्य रूप से, हमें हमेशा इस बात का ध्यान रखना होता है कि अपनी बात के ज़रिये क्या हासिल करना चाहते हैं. क्योंकि हम केवल बोलने के लिये नहीं बोल रहे हैं. बातें करना आसान है, लेकिन मेरे लिये उतना ही महत्वपूर्ण है तब बोलना, जब चुप नहीं रहना चाहिये, जिससे परिणाम प्राप्त हों.

सकारात्मक परिणाम प्राप्त करने हैं, तो कुछ ऐसा कहना होगा जो किसी समस्या को हल करने में मदद कर सके. इसलिये, मैं हमेशा यह जानने की कोशिश करती हूँ कि हर एक स्थिति में सबसे उचित क्या होगा, क्योंकि हर स्थिति एक जैसी नहीं होती. कभी-कभी आपके पास बोलने और वो भी बहुत ज़ोरदार तरीक़े से बोलने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता. फिर कभी आप ऐसा भी महसूस करते हैं कि आप दूसरी रणनीतियाँ अपना सकते हैं. लेकिन मैंने कभी यह महसूस नहीं किया कि किसी ने मुझपर चुप रहने के लिये दबाव डाला हो. मैं हमेशा, जो भी आवश्यक हो, वह कहने या न कहने के लिये स्वतंत्र महसूस करती हूँ.

यूएन न्यूज़: आपने कुछ ही दिन पहले चीन की यात्रा की थी. आपको क्या लगता है - वहाँ आपको कुछ हासिल हुआ?

मिशेल बाशेलेट: 17 वर्षों में मानवाधिकारों के उच्चायुक्त की यह पहली चीन यात्रा थी और मुझे राष्ट्रीय, क्षेत्रीय, स्थानीय व प्रान्तीय अधिकारियों से मिलने का अवसर मिला. मैं उन तक वो सभी सन्देश पहुँचाने में सक्षम रही, जो मुझे लगा कि उन्हें मानवाधिकारों के एक उच्चायुक्त से सुनना ज़रूरी था - क्या चीज़ें बदलनी चाहिये और कैसे क़ानून और नीतियाँ मानवाधिकार क़ानून के अनुरूप होने चाहियें, और मैंने स्वतंत्र रूप से वह सब कहा जो मुझे लगा कि उनके साथ चर्चा के लिये आवश्यक था.

यह महत्वपूर्ण था क्योंकि बहुत से वर्षों में ऐसा नहीं हुआ था. आप देखते और मानते हैं कि सभी के साथ सम्वाद महत्वपूर्ण है. और मेरे लिये सम्वाद व सम्बन्ध बनाने एवं सभी सदस्य देशों और हितधारकों को उसमें शामिल करना ज़रूरी है. लेकिन मुझे लगता है कि कभी यह सम्वाद अच्छे परिणाम देता है, कभी नहीं.

लेकिन मैं दुनिया के सभी देशों के साथ समान रूप से सम्वाद करती हूँ. चाहे वो चीन, ब्रिटेन हो या अमेरिका या कोई विकासशील देश हो, मैं किसी तरह का भेदभाव नहीं करती. सम्वाद आगे जारी रखने के लिये कुछ नियम ज़रूर परिभाषित किये जाते हैं, भविष्य में OHCHR के साथ कुछ क़ानूनों का विश्लेषण करने के सन्दर्भ में, जहाँ हमें लगता है कि मानवाधिकार क़ानूनों का पालन नहीं हो रहा है, या फिर अल्पसंख्यकों के मानवाधिकारों, जातीय समूहों व उनके मानव अधिकारों, स्वतंत्रता, धर्म सम्बन्धी मानवाधिकारों, व्यापार सम्बन्धी मानवाधिकारों जैसे विषय, जहाँ हमें मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप प्राप्त हुए हैं.

यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, स्वीडन की युवती जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के साथ, 2019 में मैड्रिड में कॉप25 के दौरान मुलाक़ात करते हुए.
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यूएन मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, स्वीडन की युवती जलवायु कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग के साथ, 2019 में मैड्रिड में कॉप25 के दौरान मुलाक़ात करते हुए.

यूएन न्यूज़: जब आप यूक्रेन जैसे रडार पर रहने वाले देशों में संघर्ष के दौरान मानवाधिकारों का उल्लंघन होते हुए देखती हैं, या फिर यमन, या टीगरे के संघर्ष में भी इनका उल्लंघन होते देखती हैं,  तो ऐसे में आप क्या करना चाहती हैं?

मिशेल बाशेलेट: हम इन सभी मुद्दों पर काम करना जारी रखते हैं, लेकिन मैं चाहती हूँ कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय उन स्थितियों को भूलाएँ नहीं, क्योंकि कभी-कभी एजेण्डे में बहुत से मुद्दे होते हैं और कुछ मुद्दे मीडिया के लिये राजनैतिक रूप से अधिक प्रासंगिक होते हैं, ख़ासतौर पर लम्बे संघर्ष से सम्बन्धित, ऐसे में मुझे लगता है कि उन्हें भुला दिया जाता है, और लोग अन्तरराष्ट्रीय समुदाय द्वारा नज़रअन्दाज़ किया हुआ महसूस करते हैं. उदाहरण के लिये, यमन में देखें तो संघर्ष विराम के बावजूद उल्लंघन हो रहे हैं.

युद्धविराम एक अच्छी बात है, लेकिन हमें अब राजनैतिक सम्वाद, राजनैतिक प्रक्रिया और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी ज़रूरत है. इसलिये हालाँकि संघर्ष कम होने से मानवीय कार्यकर्ताओं की समर्थन क्षमता में सुधार हुआ है, लेकिन मानवीय सहायता के लिये केवल 41 प्रतिशत रक़म ही मिल पाई है.

हम यदि सीरिया की बात करें, तो संघर्ष के हालात, नियमित रूप से टेलीविज़न स्क्रीन पर दिखाई देते हैं. लेकिन महत्वपूर्ण यह भी है कि हज़ारों लापता लोगों को खोजने का काम अभी बाक़ी है, और महासचिव एक रिपोर्ट जारी करने जा रहे हैं, जिसमें इसे लेकर कार्रवाई पर एक निश्चित तंत्र का प्रस्ताव होगा.

उदाहरण के लिये साहेल की बात करें तो मैंने, बुर्कीना फ़ासो की अपनी यात्रा के दौरान, बुर्कीना, निजेर, माली में अत्यधिक अन्तर-संकट देखा. मुझे लगता है कि यह महत्वपूर्ण है कि अन्तरराष्ट्रीय समुदाय इसके लिये अपना समर्थन बढ़ाए.

और हेती में, हमने इस साल जनवरी और जून के बीच राजधानी में 934 लोगों की हत्याओं और 680 अपहरणों का आलेखन किया गया है. यहाँ गिरोहों के बीच झड़पें भी होती हैं, जिसका मतलब है कि 3 लाख 38 हज़ार लोग, सशस्त्र हिंसा के कारण आन्तरिक रूप से विस्थापित हैं; और, 5 हज़ार बच्चे स्कूल से बाहर हो गए हैं. इसलिये इन आँकड़ों से स्पष्ट हो जाता है कि हेती व उन अन्य संकटों का, अन्तरराष्ट्रीय एजेण्डे में रहना क्यों ज़रूरी है.

यूएन न्यूज़: और अन्त में, आपके उत्तराधिकारी के लिये कोई सलाह या सिफ़ारिश?

मिशेल बाशेलेट: जो भी इस पद पर आएंगे, उम्मीद है कि उनके साथ मेरी व्यक्तिगत बातचीत होगी. तो सबसे पहले, मैं अपने अनुभव उनके साथ साझा करूँगी, क्योंकि आप इस पद पर आने से पहले अक्सर पूरी तरह नहीं जान पाते हैं, और साथ ही अपने सीखे सबक़ भी उनके सामने रखूंगी.

मेरी सलाह होगी कि दिमाग़ खुला रखें, और यह समझने के लिये कि स्थिति इतनी कठिन क्यों है, हितधारकों के साथ, सभी सदस्य देशों के साथ जुड़ें, क्योंकि यहाँ आपको निर्बल लोगों की आवाज़ बनना होगा. लेकिन दूसरी ओर, आपकी ज़िम्मेदारी सदस्य देशों के साथ जुड़ने, तकनीकी सहायता, क्षमता निर्माण में मदद करने और साथ ही साथ निगरानी व रिपोर्टिंग करने की भी होगी. तो कभी-कभी यह शासनादेश (Mandate) विरोधाभासी भी हो सकता है, जिससे यह हमेशा आसान नहीं होता, लेकिन इससे निपटने के तरीक़े मौजूद हैं, और मैं उनमें से प्रत्येक मुद्दे पर उन्हें विशेष सलाह देना चाहूंगी.

यूएन न्यूज़: उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद!