12 नवंबर 2019

वर्ष 2019 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार तीन विद्वानों – एस्थर डफ़लो, अभिजीत बैनर्जी और माइकल क्रेमर - को दिया गया है.  डॉक्टर अभिजीत बैनर्जी अमेरिका के एमआईटी संस्थान में अर्धशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और अनेक देशों में ऐसे प्रयोगों का हिस्सा रहे हैं जिनके तहत ग़रीब लोगों को कुछ प्रशिक्षण देकर हालात सुधारने का मौक़ा दिया जाता है. पेश है सह-विजेता प्रोफ़ेसर अभिजीत बैनर्जी के साथ यूएन हिन्दी न्यूज़ के प्रमुख महबूब ख़ान की एक ख़ास बातचीत.

प्रश्नआप का काम या रिसर्च क्या है जिसके आधार पर आपको प्रसिद्धि और ये नोबेल पुरस्कार मिला?

उत्तर – हम कुछ इस तरह से काम करते हैं कि अगर कभी हमें सेहत के लिए कुछ करना है या फिर ऐसा कोई इंटरवेन्शन यानी प्रयोग करना होता है तो कैसे पता चलेगा कि वो कामयाब है या नहीं. तो उसमें बड़े पैमाने पर लॉटरी की तर्ज़ पर बड़े पैमाने पर प्रयोग करते हैं जिन्हें रैन्डेमाइज़्ड कंट्रोल ट्रायल यानी प्रयोग कहा जाता है.

ये प्रयोग कहाँ किया जाना है इस बारे में तय करने के बाद हम देखते हैं कि इससे कोई असर पड़ता है या नहीं, जो आशा थी वो पूरी हुई कि नहीं, अच्छा हुआ या बुरा हुआ. तो इस तरह के कई काम हम कर चुके हैं. एक संस्था है उसका नाम है, “अब्दुल लतीफ जमील पावर्टी एक्शन लैब - जे-पैल”, उसकी तरफ़ से और हम काफ़ी लोग मिलकर एकसाथ काम करते हैं.

हम लोगों ने अभी तक शायद लगभग 1000 रैन्डेमाइज़्ड कंट्रोल ट्रायल यानी प्रयोग किए हैं. उसके जो नतीजे आते हैं, सरकार और संस्थान उसकी जानकारी लेते हैं और हम लोग उन प्रयोगों पर काम करते हैं. और फिर हम आगे ये सूचना देते हैं के ये कैसे काम करता है और कैसे नही.

इस इंटरव्यू का ऑडियो सुनने के लिए यहां क्लिक करें. 

प्रश्न  क्या भारत में आपने कोई ऐसा प्रयोग किया और वहां पर ग़रीबी दूर करने में कोई कामयाबी मिली? अगर वो सफल रहा तो क्या किसी अन्य देश में भी लागू किया गया?

उत्तर -  एक हम लोगों ने पश्चिम बंगाल में किया था और वैसा ही प्रयोग बांगलादेश और पाकिस्तान में भी किया गया. ग़रीबी मापने में दो तरह के सिद्धांतों का सहारा लिया जाता है - एक कि कुछ लोग अपने आपमें ज़्यादा क़ामयाब नहीं होते हैं और दूसरा ये कि कुछ लोग कामयाब तो हैं मगर उनको मौक़ा नहीं मिला.

तो हमने सबसे गहरी ग़रीबी में रहने वाले लोगों के साथ ये प्रयोग किया था. जैसे कि मैंने पहले बताया कि लॉटरी के तरीक़े से जिनको चुना गया है, उनको हमने उस संस्था के साथ जोड़ के कुछ ऐसेट यानी संपदा दिए. ऐसेट यानी संपदा का मतलब ये है कि उन्हें गाय चाहिए तो गाय दी, भैंस चाहिए तो भैंस दी और अगर छोटे कारोबार के लिए रक़द देने की ज़रूरत समझी तो वो रक़म भेंट में दे दी.

उसके साथ कुछ कोचिंग भी दी कि अगर आप इस रक़म के साथ अपना कारोबार इस तरह से करो तो ये ठीक होगा और आपको फ़ायदा होगा.

और इसके बाद हमने जिन्हें ये दिया उनको पहले दो साल बाद, फिर तीन साल बाद, उसके बाद सात साल बाद और फिर दस साल बाद उसे देखते हैं कि उसके लिए क्या बदला हैं. जिन लोगों को ये मदद मिली वो ये मदद नहीं मिलने वालों के मुक़ाबले आर्थिक तौर पर काफी बेहतर हैं. इसका कारण है कि पहले तो उनको एक संपदा मिली और उस संपदा से उनको अतिरिक्त आमदनी हुई.

उसके बाद उस आमदनी को लेकर उन्होंने और अन्य नए कोरोबार किए और इस वजह से अभी भी दस साल बाद उनका उपभोग क़रीब 25-30 प्रतिशत ज़्यादा हो रहा है. ये लोग कामयाब थे लेकिन उन्हें मौक़ा नहीं मिलता था, और जब उन्हें मौक़ा दिया गया तो उन्हें उससे फ़ायदा हुआ.

प्रश्न क्या नक़दी रक़म देने से लोगों में ज़्यादा कामयाबी दर देखी गई है या फिर सिर्फ़ ऐसेट या संपदा देने से.

उत्तर – ये तो मुझे पता नहीं है. हाँ एसेट वाला प्रयोग हमने क़रीब सात देशों में किया - बांगलादेश, भारत, पाकिस्तान, इथोपिया, घाना, पेरु और होंडूरस. सातों देशों में अलग- अलग ऐसेट दिए, पर कैश या नक़दी रक़म कहीं नहीं दिए गए.

प्रश्न जिन देशों में आपने ये प्रयोग किया है, क्या उन देशों की सरकारें इस प्रयोग को समझ नहीं पा रहीं हैं या फिर उनकी मंशा नहीं है कि बड़े पैमाने पर ग़रीबों की मदद करके ग़रीबी को बिल्कुल ही ख़त्म कर दिया जाए?

उत्तर – कुछ कुछ ऐसा हो रहा है. भारत में झारख़ड और बिहार जैसे राज्यों में ऐसा करने की कोशिश हो रही है. कुछ कुछ स्टेटस ऐसा करते हैं. ऐसा नहीं है कि वो कहते हैं कि ये नहीं होना चाहिए पर इसके लिए निवेश करने की ज़रूरत होती है, और जितना होना चाहिए उतना नहीं हो रहा लेकिन फिर भी कुछ हो रहा हैं. बिहार ने ये घोषित किया कि एक लाख परिवारों को वो इसमें शामिल करेगें.

प्रश्न - क्या आपको लगता रहा है कि बहुत सी सरकारे सिर्फ़ नारेबाज़ी पर चलने की कोशिश करती हैं जैसे मार्कटिंग में कुछ आंकड़े पेश कर के जल्दी से उसके रिज़ल्ट दिखाने की कोशिश की जाती है, क्या आपको लगता है बहुत सी सरकारें लोगों के वोट को प्रभावित करने के लिए, बहुत सारी योजनाएँ घोषित करती हैं और नारेबाज़ी करती हैं, मगर वास्तविकता में इसके कोई सकारात्मक परिणाम नज़र नहीं आते?

उत्तर – देखिए नारेबाज़ी तो बहुत होती है, हर सरकार को कुछ करने का मौक़ा मिलता है, उसमें कोई करता है और कोई नहीं करता है. मुझे ऐसा नहीं लगता है कि सिर्फ़ सारी नारेबाज़ी ही है. हमने जो अख़बारों लिखा वो ख़ासतौर से ग्रोथ यानी प्रगति की अवधारणा ख़िलाफ़ था.

प्रगति के बारे में बहुत से लोग बात तो करते हैं पर ग्रोथ को कैसे बदला जाता है, वो किसी को पता नहीं है. हम कहते हैं कि जब ग्रोथ होती है तो बहुत सी सरकारें उसका श्रेय तो लेती हैं लेकिन जब ग्रोथ नहीं होती है तो नहीं मानते हैं कि ये उनकी वजह से हुआ. ज़्यादातर को नहीं मालूम होता कि ग्रोथ कैसे होती है.

प्रश्न – आपने अन्य देशों के साथ साथ भारत, पाकिस्तान के साथ भी काम किया है. जब आपने अपने कार्यक्रम और योजनाएँ सरकारों के सामने रखे तो क्या आपको सरकारों से सहयोग मिला या सरकारों की तरफ़ से बेपरवाही थी.

उत्तरदेखिए दोनों होता है, कभी-कभी लोग बहुत दिलचस्पी लेते हैं, पाकिस्तान में मैंने ख़ास नहीं किया लेकिन मेरे जे-पैल में बहुत साथी हैं जिन्होंने काम किया है, भारत में भी मेरा काफ़ी अनुभव है, बांगलादेश में मैने नहीं किया लेकिन और लोगों ने किया है. तो कभी-कभी अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है और कभी नहीं मिलती.

और कभी ऐसी भी प्रतिक्रिया मिलती है कि हाँ, आप सही कह रहे हैं लेकिन अगर आप ये करवाना चाहते हैं तो आप ख़ुद आकर करवाइए. हमारे पास संसाधन नहीं हैं. तो कभी-कभी ऐसा होता है कि वो लोग मान जाते हैं लेकिन होता नहीं है.

प्रश्न – हालात बेहतर करने के लिए लोगों के अपने स्थानों से दूसरे स्थानों पर जाने यानी प्रवासन हर स्तर पर हो रहा है, लोग गाँवों से क़स्बों में और क़स्बों से शहरों में जाते हैं, और एक देश से दूसरे देश में जाते हैं. तो आपके ख़याल से ये फ़िक्र की बात है या इससे वैश्विक स्तर पर दरपेश चुनौतियों और मुशकिलों को दूर करने में और आपसी समझ बढ़ाने में मदद मिलती है?

उत्तर हमारी नई किताब से ये संदर्भ लिया गया है. हमारा सुझाव यही है कि इमीग्रेशन से इतना डरने का कोई कारण नहीं है. इमीग्रेशन इतना ज़्यादा भी नहीं होता, लोग अपने घरों में और स्थानों पर ही रहना पसंद करते हैं और बहुत जगह मौक़ा होता भी है, फिर भी लोग इमीग्रेशन नहीं करते.

उदाहरण के तौर पर, ग्रीस में जब आर्थिक संकट हुआ था, 40-50 प्रतिशत आबादी बेरोज़गार थी लेकिन उनमें से बहुत कम लोग वहां से योरोप गए, क्योंकि लोगों को जाना बहुत मुश्किल लगता है.

ऐसा भी नहीं है कि इमीग्रेशन नहीं होता है, कभी कभी जीना अंसभव हो जाता है तब लोग वहां से कहीं और जाने की कोशिश करते हैं. जो लोग जाते हैं वो ज़्यादातर क़ामयाब लोग होते हैं, जिनकी काफ़ी महत्वाकांक्षा होती है. ऐसे लोग जहां पहुंचते हैं वहां के लिए अच्छा ही होता है. 

प्रश्न – संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्यों का पूरा एक विकास एजेंडा है जिसे 2030 तक पूरा करने के उम्मीद लगाई गई है और उसके लिए कोशिशें हो रही हैं. क्या आपको लगता है कि 2030 तक दुनिया ये लक्ष्य हासिल कर पाएगी?

उत्तर – मेरे ख़याल से नहीं. लक्ष्य होते हैं - प्रेरित करने के लिए. हासिल तो मेरे ख़याल से नहीं होगा. लक्ष्य काफ़ी महत्वाकांक्षी थे. मुझे याद है जब इन लक्ष्यों को तैयार करने पर काम हो रहा था तो मैं भी कुछ दिन के लिए यूएन के साथ जुड़ा था. कुछ देशों में इन लक्ष्यों को हासिल करना शायद संभव होगा, कहीं नहीं होगा लेकिन लक्ष्य सही थे.

कम से कम ग़रीबी के बारे में जो लक्ष्य थे वो सही थे. अभी विश्व की अर्थव्यवस्था में कुछ समस्याएँ भी आ रही हैं. अमरीका और चीन की जो लड़ाई चल रही है उसकी वजह से भी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है. मेरे ख़याल से जितना होना संभव था, वो भी नहीं हो पाएगा लेकिन जो अभी तक हुआ है वो फिर भी काफ़ी अच्छा ही है.

प्रश्न – आपको लक्ष्य हासिल नहीं होने की क्या वजहें लग रही हैं? क्या राजनैतिक इच्छा की कमी लग रही है या फिर राजनैतिक नेताओं में कुछ ठोस करने का जज़्बा नहीं है या फिर उनकी कोशिशें काफ़ी नहीं हैं?

उत्तर – ये काफ़ी बड़ी चुनौती थी, राजनैतिक इच्छा भी हर समय नहीं होती और विश्व अर्थव्यवस्था में भी दिक़्क़ते आ रही हैं. जैसेकि अमरीका में विकास काफ़ी सुस्त हो गया है और एशिया में भी ऐसा ही हो रहा है. ये सारी मुशकिलें तो आ रही हैं. तो कुछ तो राजनेताओं के नियंत्रण में है और कुछ नहीं है.

 

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