उसकी गिनती, जो वास्तव में मायने रखती हैं
भारत में सार्वजनिक बजट दैनिक जीवन को आकार देते हैं. कक्षाओं और स्वास्थ्य केन्द्रों से लेकर सुरक्षा, स्वच्छता और सामाजिक संरक्षण तक, इनका असर हर जगह दिखाई देता है. फिर भी अनेक महिलाओं और लड़कियों की ज़रूरतें और प्राथमिकताएँ हमेशा इन बजटों में ठीक तरह से नहीं झलकतीं.
इसी चुनौती को ध्यान में रखते हुए, संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था (UN Women) ने केन्द्र और प्रान्तीय सरकारों के साथ मिलकर, लैंगिक उत्तरदाई बजट व्यवस्था पर लगातार काम किया है. इसका उद्देश्य सार्वजनिक व्यय को लैंगिक नज़रिए से बेहतर ढंग से समझना और परखना है. आज यह व्यवस्था केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि महिलाओं और लड़कियों के लिए अधिक न्याय और जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण रास्ता बन गई है.
स्थानीय बीजों को पुनर्जीवन
ओडिशा के मयूरभंज ज़िले की तुंगाबिला पंचायत के सननालोई गाँव में वासंती मोहांतो स्थानीय बीजों को पुनर्जीवित करने के साथ महिलाओं की आजीविका भी मज़बूत कर रही हैं. अपनी सास से धान के पारम्परिक बीज पाने के बाद उनके भीतर इन फ़सलों को बचाने का संकल्प पैदा हुआ. जब हाइब्रिड बीजों का प्रसार बढ़ा और स्थानीय क़िस्में घटने लगीं तो, उन्होंने इस ख़तरे को पहचनाते हुए महिलाओं को स्वतंत्र रूप से खेती करने के लिए प्रेरित किया. आज गाँव की लगभग आधी महिलाएँ अपनी ज़मीन पर खेती कर रही हैं और आय अर्जित कर रही हैं.
साल 2023 में वासंती और उनके स्वयं सहायता समूह ने एक सामुदायिक बीज बैंक स्थापित किया, जहाँ 30 से 40 देशज धान क़िस्मों के साथ मोटे अनाज, दालें, तिलहन और सब्ज़ियों का संरक्षण हो रहा है. उन्होंने, खाद्य और कृषि संगठन (FAO) के सहयोग से, धान की 16 पारम्परिक क़िस्मों पर सहभागी क़िस्म परीक्षण किए और बीज भंडारण, कीट प्रबन्धन तथा वैज्ञानिक दूरी का प्रशिक्षण भी प्राप्त किया. यह बीज बैंक आज, सैकड़ों किसानों के लिए एक महत्त्वपूर्ण स्थानीय संसाधन बन चुका है.
ओडिशा की कृषि विरासत को नया जीवन
ओडिशा के कोरापुट ज़िले के नुआगुड़ा गाँव में जैविक किसान और सामुदायिक बीज संरक्षक रैमाती घिउरिया ने लगभग 70 पारम्परिक धान क़िस्मों और 30 बाजरा क़िस्मों का संरक्षण किया है. उन्हें “बाजरे की रानी” भी कहा जाता है. उन्होंने, अनियमित वर्षा, मिट्टी की घटती उर्वरता और बाज़ार में कम मांग के बीच, आसपास के गाँवों से देशज बीज इकट्ठा किए और उन्हें फिर से उगाने की पहल की.
उन्होंने, एम एस स्वामीनाथन शोध संस्थान के सहयोग से, समुदाय के साथ मिलकर बीज पंथी नाम का एक गाँव स्तरीय बीज बैंक स्थापित किया. आज वह महिलाओं को पारम्परिक धान, बाजरा और सब्ज़ियों के संरक्षण का प्रशिक्षण देती हैं और पौष्टिक अनाज को बढ़ावा देती हैं. उनके काम को सम्मान देते हुए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने वर्ष 2024 में उन्हें मानद डॉक्टरेट उपाधि प्रदान की.
आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते क़दम
59 वर्षीय वानलालफेली ज़ोटे, पिछले 30 वर्षों से सुअर पालन कर रही हैं. इससे उन्हें अपनी आय अर्जित करने और परिवार के भरण-पोषण में सहारा मिला है. बेहतर प्रजनन सेवाओं की बदौलत अब उनके यहाँ सुअर के अधिक स्वस्थ बच्चे पैदा हो रहे हैं. यह प्रगति भारत में अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष समर्थित FOCUS परियोजना के ज़रिए सम्भव हुई है.
अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) एक ऐसी अन्तरराष्ट्रीय वित्तीय संस्था है, जो केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं के रूपान्तरण पर केन्द्रित है. यह ग्रामीण लोगों और समुदायों में निवेश कर खाद्य सुरक्षा, समृद्धि और स्थिरता को मज़बूत बनाने का काम करता है. वर्तमान में इसके और इसके साझीदारों की लगभग 23 अरब अमेरिकी डॉलर की रक़म, विश्व भर की चल रही परियोजनाओं में निवेशित हैं.
गृहिणी से व्यवसाई तक
तेलंगाना के निज़ामाबाद ज़िले के न्यावनंदी गाँव की 31 वर्षीय संगीता एक गृहिणी और ख़ाली समय में दर्जी का काम करती थीं. पहले वो अपने पति द्वारा बहरीन से भेजी जाने वाली धनराशि के सहारे परिवार चलाती थीं. लेकिन कोरोनावायरस महामारी के दौरान छह महीने तक वेतन न हीं मिलने के कारण उनके पति को वर्ष 2024 में भारत लौटना पड़ा, जिसके बाद परिवार के सामने नई चुनौतियाँ खड़ी हो गईं.
वर्ष 2024 से भारत में अन्तरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन (IOM), अपने स्थानीय कार्यान्वयन सहयोगी राष्ट्रीय श्रमिक कल्याण ट्रस्ट के साथ मिलकर, जलवायु-प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीण समुदायों की सहनसक्षमता बढ़ाने पर काम कर रहा है.
इसी पहल के तहत संगीता और उनके पति को जलवायु-सहनसक्षम आजीविका के लिए उपयुक्त माना गया. संगीता ने बचत की हुई धनराशि को शुरुआती पूंजी के रूप में इस्तेमाल किया और परियोजना के सहयोग से दिसम्बर 2025 में अपनी गली का एकमात्र जनरल स्टोर खोला. जनवरी के अन्त तक उनकी बिक्री 1,03,000 रुपए तक पहुँच गई.
आज वह घर में आर्थिक फ़ैसले लेने वाली महिला हैं और दूसरी महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. वह कहती हैं, “प्रवास ने हमें जीवित रहने में मदद की. लेकिन इस दुकान ने हमें सम्मान के साथ जीना सिखाया.”
महिला बीज संरक्षकों का सम्मान
अन्तरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) समर्थित - FOCUS नागालैंड परियोजना के नवाचार कोष कार्यक्रम के सहयोग से, कोहिमा ज़िले के जाखामा गाँव में स्थापित सामुदायिक बीज बैंक स्थानीय बीजों का संरक्षण कर रहा है.
साथ ही यह संगठन, बीज उत्पादन से जुड़ी आजीविका और उद्यमिता के नए अवसर भी पैदा कर रहा है.
बीज संरक्षकों, युवाओं और महिला किसानों की 17 सदस्यों वाली प्रबन्धन समिति इस पहल का नेतृत्व कर रही है. गाँव ने इसे पूरे उत्साह से अपनाया है. बीज बैंक में 60 बीज उत्पादक जुड़े हैं और बीज संग्रह, छँटाई तथा ग्रेडिंग का काम जारी है.
इस पहल की प्रमुख महिलाओं में 46 वर्षीय मखाशेनेनु ज़ाओ भी शामिल हैं, जो पारम्परिक फ़सल विविधता के संरक्षण के साथ समुदाय की आजीविका को भी मज़बूत बना रही हैं.
सभी महिलाओं के लिए अवसरों में वृद्धि
कोलकाता की ट्रांसजैंडर महिला रात्रिश साहा की कहानी दिखाती है कि अवसरों में सभी महिलाओं की भागेदारी ज़रूरी है. उन्हें सात वर्षों का पेशेवर अनुभव होने के बावजूद, रोज़गार के लिए आवेदन करते समय, बार-बार भेदभाव का सामना करना पड़ा.
वह कहती हैं, “एक ट्रांसजैंडर महिला के लिए रोज़गार ढूँढ़ना कभी आसान नहीं होता.” उन्हें अक्सर यह कहकर मना कर दिया जाता था कि “अभी एलजीबीटी भर्ती नहीं हो रही है” या “हमारे दफ़्तर में ट्रांस व्यक्ति के लिए व्यवस्था नहीं है.”
ट्रांसजैंडर कल्याण इक्विटी और सशक्तिकरण ट्रस्ट फाउंडेशन के सहयोग से रात्रिश को नए अवसर मिले और बाद में उन्हें बेंगलुरु में सीमेंस टैक्नॉलॉजी में एसोसिएट कंसल्टेंट की भूमिका मिली.
वह कहती हैं, “मैंने केवल अपनी क्षमताओं के बारे में बात की. बातचीत का केन्द्र मेरी लैंगिक पहचान नहीं थी.”
उनका अनुभव दिखाता है कि समुदायों, सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी सम्मानजनक रोज़गार और आर्थिक अवसरों तक पहुँच बढ़ा सकती है.
रात्रिश की कहानियाँ याद दिलाती हैं कि लैंगिक समानता का अर्थ ट्रांसजैंडर महिलाओं समेत सभी महिलाओं के लिए अवसर, भागेदारी और गरिमा सुनिश्चित करना है.
भूमि अधिकारों से बदला सोमारी बाई का जीवन
छत्तीसगढ़ के दूरदराज़ आदिवासी क्षेत्र में गोंड समुदाय की 60 वर्षीय सोमारी बाई ने अपने पति और ससुराल वालों को खोने के बाद, अपने दो बेटों की परवरिश अकेले करते हुए वर्षों तक संघर्ष किया.
सोमारी बाई, अपनी ज़मीन नहीं होने के कारण, महुआ के फूल, तेन्दू पत्ता और जंगली फलों जैसे वन उत्पाद इकट्ठा करके, स्थानीय बाज़ारों में बेचकर गुज़ारा करती थीं, जिससे बहुत कम और अनिश्चित आय होती थी.
सोमारी को, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) और सरकारी संस्थाओं के सहयोग से वन अधिकार अधिनियम के बेहतर क्रियान्वयन के तहत, 2.5 एकड़ भूमि का अधिकार पत्र मिला.
इसके बाद उन्होंने धान और सब्ज़ियों की खेती शुरू की, बोरवेल में निवेश किया, और उनकी वार्षिक आय लगभग 25 हजा़ा रुपए से बढ़कर 1 लाख 20 हज़ार रुपए हो गई.
सोमारी बाई की कहानी दिखाती है कि भूमि अधिकार और संस्थागत सहयोग मिलकर आदिवासी महिलाओं के लिए आजीविका, गरिमा और आत्मनिर्णय के नए रास्ते खोल सकते हैं.
पत्तों से आजीविका तक
तमिलनाडु के कन्याकुमारी में 22 युवा ग्रामीण महिलाएँ सनबर्ड स्ट्रॉज़ द्वारा विकसित जैव-अपघटनीय स्ट्रॉ उत्पादन के हरित कौशल कार्यक्रम के माध्यम से सामाजिक उद्यमी बनी हैं.
नारियल के पत्तों के अपशिष्ट के प्रसंस्करण, टिकाऊ विनिर्माण और व्यवसाय संचालन का प्रशिक्षण पाने के बाद, वे अब एक स्थानीय इकाई चला रही हैं, जो हर सप्ताह 40 हज़ार से अधिक ईको-स्ट्रॉ तैयार करती है.
इस पहल ने 2 लाख से अधिक प्लास्टिक स्ट्रॉ का टिकाऊ विकल्प उपलब्ध कराया है, साथ ही सम्मानजनक और जलवायु-सहनशील आजीविका भी बनाई है.
ये महिलाएँ, कृषि अपशिष्ट को एक सफल व्यवसाय में बदलकर, सर्कुलर अर्थव्यवस्था और स्थानीय आर्थिक सशक्तिकरण, दोनों को आगे बढ़ा रही हैं.
तमिलनाडु में लड़कियों के लिए जलवायु-सहनसक्षम कक्षाएँ
तमिलनाडु में बढ़ते तापमान के बीच, विशेषकर घनी शहरी बस्तियों में स्थित कई सरकारी स्कूलों की कक्षाएँ बहुत गर्म होती जा रही हैं. इसका असर लड़कियों की एकाग्रता, उपस्थिति और स्वास्थ्य पर पड़ रहा है.
अम्बत्तूर के पेरुंथलैवर कामराजर बालिका स्कूल में इसका एक व्यावहारिक समाधान सामने आया है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP), विकास एवं सहयोग के लिए स्विस एजेंसी द्वारा वित्तपोषित BeCool परियोजना के तहत, तमिलनाडु सरकार के साथ मिलकर कक्षाओं को अधिक ठंडा और स्वस्थ बनाने में मदद कर रहा है.
इस पहल के तहत ठंडी छत, अधिक ऊर्जा-कुशल पंखे, सौर ऊर्जा और प्रकृति-आधारित उपाय अपनाए जा रहे हैं. इससे कक्षाओं के भीतर का तापमान 3 से 4 डिग्री सैल्सियस तक कम हुआ है.
अब इस कार्यक्रम का विस्तार 297 स्कूलों तक किया जा रहा है, जिससे 1 लाख 48 हज़ार से अधिक विद्यार्थी लाभान्वित होंगे.
हस्तकला से उम्मीद और आजीविका
नई दिल्ली के मदनपुर खादर में रहने वाली 24 वर्षीय रोहिंग्या शरणार्थी मीज़ान ने विस्थापन, सीमित शिक्षा और आजीविका के कम अवसरों के बीच अपना जीवन बिताया है. तीन छोटे बच्चों सहित छह लोगों के परिवार की ज़िम्मेदारी ने, उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता की राह को और कठिन बना दिया.
मीज़ान ने, संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त कार्यालय (UNHCR) और उसके साझेदारों के सहयोग से, क्रोशिया के अपने बचपन के शौक को एक बढ़ते हुए उद्यम में बदल दिया.
उन्होंने, डिज़ाइन, उत्पाद विकास और डिजिटल विपणन का प्रशिक्षण पाकर फ़ाइबर कला की नींव रखी. आज वह 10 से अधिक महिलाओं को क्रोशिया का प्रशिक्षण दे चुकी हैं.
उनका काम न केवल उनके परिवार के भरण-पोषण में मदद कर रहा है, बल्कि समुदाय के बीच रिश्तों को भी मज़बूत बना रहा है.
मीज़ान चाहती हैं कि फ़ाइबर कला आगे चलकर एक ऐसा पहचान प्राप्त ब्रांड बने, जो उनके जैसी महिलाओं के लिए सम्मानजनक रोज़गार के अवसर पैदा करे.
उद्यम से मज़बूती
म्याँमार के चिन समुदाय से आने वाली शरणार्थी लाल पियान पुई ने अनिश्चितता और सीमित आर्थिक अवसरों के बीच अपने जीवन को फिर से सँवारना शुरू किया. कम संसाधनों और तीन छोटे बच्चों की ज़िम्मेदारी के साथ उन्हें विस्थापन और औपचारिक रोज़गार तक सीमित पहुँच जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.
उन्होंने, बेहतर भविष्य बनाने के संकल्प के साथ, वर्ष 2015 में अपने घर से एक छोटा ब्यूटी पार्लर शुरू किया. लगातार मेहनत, व्यवसाय विकास सहयोग और एक अनुदान की मदद से उन्होंने अपनी सेवाओं का विस्तार किया.
वर्ष 2022 में उन्होंने जेनिफ़र की स्थापना की, जो एक सामुदायिक पेशेवर सैलून और प्रशिक्षण केन्द्र है. अब तक वह 35 से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण दे चुकी हैं और चार महिलाओं को सवेतन प्रशिक्षण का अवसर दे रही हैं.
उनका यह उद्यम न केवल उनके परिवार का सहारा है, बल्कि अन्य महिलाओं के लिए कौशल, आय और नए अवसरों का रास्ता भी खोल रहा है.
सीखने से आमदनी तक
24 वर्षीय मोनिका, जयपुर ज़िले के फुलेरा के पास समालपुरा गाँव के 14 सदस्यीय परिवार की सबसे छोटी सदस्य हैं. उनके गाँव में कक्षा 8 तक ही शिक्षा की सुविधा थी, इसलिए आगे शिक्षा हासिल करने के लिए उन्हें गाँव से बाहर जाना पड़ा.
उन्होंने अपने पिता के सहयोग से आगे की शिक्षा पूरी की और बाद में सरकारी परीक्षाओं की तैयारी के साथ एक स्थानीय रोज़गार भी शुरू किया.
इसी दौरान वह संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के युवाह (UNICEF-YuWaah) के एक निःशुल्क ऑनलाइन कौशल कार्यक्रम से जुड़ीं, जहाँ उन्होंने डिजिटल, कम्प्यूटर और कार्यस्थल से जुड़े कौशल सीखे. इन कौशलों की मदद से वह बिक्री के काम से आगे बढ़कर बिलिंग की भूमिका तक पहुँचीं और उनकी आय बढ़ी.
आज मोनिका अपने परिवार का सहारा बन रही हैं और अपने समुदाय की अन्य लड़कियों को भी आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं.
अद्विका पहल से लड़कियों को मिला अपना भविष्य चुनने का अधिकार
अद्विका की युवा सदस्य आशा साहू कहती हैं, “सब लोग मेरी माँ से कहते थे कि मेरी शादी कर दो. लेकिन मैंने मना कर दिया. मैंने उनसे कहा कि मुझे काम करना है और सफल बनना है.”
यह बदलाव ओडिशा में अद्विका पहल के माध्यम से दिखाई दे रहा है, जिसकी शुरुआत अक्टूबर 2020 में हुई. यह कार्यक्रम प्रदेश सरकार और संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF) के सहयोग से बाल विवाह रोकने के व्यापक प्रयासों का हिस्सा है.
अद्विका शिक्षा, कौशल, नेतृत्व प्रशिक्षण और सामुदायिक भागेदारी के ज़रिए किशोरियों को सशक्त बनाता है, साथ ही बाल संरक्षण और सरकारी समन्वय को भी मज़बूत करता है.
इसका असर स्पष्ट नज़र आ रहा है. 11,000 से अधिक गाँव बाल विवाह-मुक्त घोषित किए जा चुके हैं, वर्ष 2022 में लगभग 950 बाल विवाह रोके गए, और गोपालपुर अब बाल विवाह-मुक्त हो चुका है.
उद्यमिता और आत्मनिर्भरता का नया अर्थ
रूबी गोस्वामी ने कभी नहीं सोचा था कि वह अपना व्यवसाय चलाएँगी. अपने गाँव की कई महिलाओं की तरह उन्हें भी लगता था कि उनका जीवन घर तक ही सीमित है. वह कहती हैं, “पहले हम दुकान नहीं चलाते थे. हमें लगता था कि इससे कुछ नहीं होगा, हम बस घर पर ही रहेंगे.” लेकिन यह सोच तब बदली, जब रूबी ने ख़ुद पर भरोसा किया और अपनी दुकान शुरू की.
रूबी ने, आर्थिक रूप से मज़बूत बनने के लिए ठान लिया कि वह या तो अपना कारोबार शुरू करेंगी या बाहर जाकर काम करेंगी.
संयुक्त राष्ट्र बाल कोष के युवाह (UNICEF-YuWaah) और उसके साझीदारों के एक छोटे प्रशिक्षण कार्यक्रम से उन्होंने हिसाब-किताब रखना, UPI के तहत डिजिटल भुगतान दर्ज करना, ख़र्च समझना और मासिक आय का आकलन करना सीखा.
इन कौशलों ने उनके व्यवसाय और आत्मविश्वास, दोनों को मज़बूत किया. आज रूबी अपनी ‘दीदी की दुकान’ चलाती हैं और गर्व से ख़ुद को एक उद्यमी मानती हैं. रूबी और उनके जैसी 220 से अधिक महिलाओं के लिए उद्यमिता केवल आय नहीं, बल्कि सम्मान, आत्मविश्वास और नई पहचान लेकर आई है.
जलवायु कार्रवाई में महिलाओं की आवाज़ जोड़ना
भारत में जलवायु परिवर्तन के कारण बाढ़, चरम मौसम की घटनाएँ और पारिस्थितिकी तंत्र का क्षरण बढ़ रहा है. महिलाएँ अक्सर इससे सबसे अधिक प्रभावित होती हैं, फिर भी सामाजिक मान्यताओं, सीमित जानकारी और भाषा सम्बन्धी बाधाओं के कारण पर्यावरण से जुड़े निर्णयों में उनकी भागेदारी कम रहती है.
उर्जस्वी सोंधी ने, अपने विश्वविद्यालय शोध के दौरान देखा कि ग्रामीण महिलाओं को जलवायु से जुड़ी चर्चाओं से बाहर रखा जाता है, जबकि वही महिलाएँ प्राकृतिक संसाधनों का प्रबन्धन करती हैं, घरों को सम्भालती हैं और रोज़ाना पर्यावरणीय बदलावों के अनुसार ख़ुद को ढालती हैं.
उन्होंने वर्ष 2022 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) में संयुक्त राष्ट्र स्वयंसेवक परियोजना सहयोगी (UNV) के रूप में काम शुरू किया. वह ऐसे प्रयासों से जुड़ी हैं जो सुरक्षित परामर्श स्थल बनाते हैं, अनुवादकों और महिला संचालकों की मौजूदगी सुनिश्चित करते हैं, और सामुदायिक मंचों को मज़बूत करते हैं, ताकि महिलाओं की भागेदारी सार्थक एवं स्थाई बन सके.
ये पहलें, मैंग्रोव बहाली से लेकर आजीविका और जैव विविधता संरक्षण तक, महिलाओं की भूमिका को लाभार्थी से निर्णयकर्ता की ओर ले जा रही हैं.
उर्जस्वी सोंधी कहती हैं, “मेरा मानना है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सभी आवाज़ों को सामने लाना और अलग-अलग दृष्टिकोणों को समझना ज़रूरी है.”
नई गर्भनिरोधक विधियाँ अपनाती महिलाएँ
राजस्थान में सवाई माधोपुर के दामुरखला गाँव की 28 वर्षीय सोनम गुर्जर कहती हैं कि सही जानकारी मिलने से उन्हें अपने प्रजनन स्वास्थ्य के बारे में सोच-समझकर फ़ैसला लेने में मदद मिली. जब उनकी बेटी केवल दो महीने की थी, तब सोनम फिर से गर्भवती हो गईं. इसके बाद उन्होंने मार्गदर्शन के लिए आशा कार्यकर्ता इन्दिरा सेन से सम्पर्क किया.
तभी उन्हें अन्तरा के बारे में जानकारी मिली, जो एक गर्भनिरोधक इंजेक्शन है. सोनम कहती हैं, “मैं पिछले दो वर्षों से इसका उपयोग कर रही हूँ. इसका नया रूप पहले वाले की तुलना में आसान और कम दर्द वाला है. जनवरी 2025 से मैं इसका उपयोग कर रही हूँ. हर तीन महीने में बस त्वचा के नीचे एक छोटा सा इंजेक्शन लगवाना होता है.”
दामुरखला की 40 वर्षीय शीतल कटारिया का अनुभव भी ऐसा ही रहा. शुरुआत में वह आशंकित थीं, लेकिन आशा कार्यकर्ता ने उन्हें पूरी प्रक्रिया समझाई. पहली ख़ुराक के बाद कुछ रक्तस्राव हुआ, पर उन्हें बताया गया कि यह सामान्य और अस्थाई है, और कुछ समय बाद उनकी स्थिति सामान्य हो गई.
पीढ़ियों को जोड़ती समझदारी की डोर
उदयपुर ज़िले के झाड़ोल ब्लॉक के सालार गाँव में 50 वर्षीय हीरमी बाई ऐसी पीढ़ी में बड़ी हुईं, जहाँ परिवार नियोजन की जानकारी बहुत कम थी. जब उनकी 20 वर्षीय बहू दुर्गा ने बच्चे को जन्म दिया, तो हीरमी ने देखा कि कम उम्र में मातृत्व और सीमित जानकारी का वही पुराना सिलसिला फिर दोहराया जा रहा है.
यह स्थिति तब बदली, जब एक आशा कार्यकर्ता ने हीरमी को अन्तरा गर्भनिरोधक इंजेक्शन के बारे में बताया. हीरमी, परामर्श और सहयोग के बाद, दुर्गा को इंजेक्शन लगवाने के लिए अपने साथ ले गईं.
आज दुर्गा गर्भधारण के दबाव में आने की बजाय, अपने स्वास्थ्य और अपने सात महीने के बेटे की देखभाल पर ध्यान दे पा रही हैं. हीरमी के लिए यह फ़ैसला चुप्पी से समझदारी भरे निर्णय की ओर बढ़ता एक पीढ़ीगत बदलाव है.
समावेशी उद्योग के ज़रिए सशक्तिकरण
भारत में विनिर्माण क्षेत्र के विस्तार के साथ समावेशी विकास का महत्व भी बढ़ रहा है. संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO), भारी उद्योग मंत्रालय और भारत के स्वचालित वाहन भाग निर्माता संघ के साथ मिलकर चलाया जा रहा ‘उदय-प्राइड’ कार्यक्रम ऑटोमोबाइल क्षेत्र के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के साथ-साथ लैंगिक समावेशन को भी बढ़ावा देता है.
जय हिन्द ऑटो टैक इंडस्ट्रीज़ में रमा महार ने डेटा एंट्री ऑपरेटर के रूप में काम शुरू किया था. उन्होंने, उदय-प्राइड के प्रशिक्षण से नए कौशल सीखने के साथ आत्मविश्वास भी हासिल किया.
एक वर्ष के भीतर उन्हें और अधिक ज़िम्मेदारी देते हुए, लाइन लीडर बना दिया गया. उनकी टीम ने दोषों में 12 प्रतिशत की कमी लाई, जबकि कम्पनी में महिलाओं की भागेदारी लगभग 40 प्रतिशत तक पहुँच गई.
आज रमा अन्य महिलाओं का मार्गदर्शन कर रही हैं और उनकी यात्रा दिखाती है कि महिलाएँ अब उद्योग में केवल भागीदार नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता भी बन रही हैं.
पश्चिम बंगाल में खुले स्थानों पर शौच के चलन को रोकना
पश्चिम बंगाल के जंगलमहल क्षेत्र में सन्थाल आदिवासी समुदाय की नेता और पंचायत सदस्य 40 वर्षीय चूरामणि हेमराम ने, स्वच्छता और गरिमा को लेकर एक सामुदायिक अभियान का नेतृत्व किया. क्षेत्र को खुले स्थानों में शौच से मुक्त घोषित किया जा चुका था, लेकिन उन्होंने देखा कि कई घरों, ख़ासतौर पर महिलाओं और लड़कियों के पास अब भी सुरक्षित व स्वच्छ शौचालय नहीं थे.
चूरामणि ने, अप्रैल 2025 में संयुक्त राष्ट्र परियोजना सेवा कार्यालय के प्रशिक्षण के बाद, कम लागत वाले दो गड्ढों वाले फ़्लश शौचालयों (twin-pit pour-flush toilets) के बारे में सीखा. उन्होंने पहले अपना शौचालय बनवाया, फिर गाँव की महिलाओं को संगठित किया और शौचालय निर्माण को बढ़ावा दिया.
उनके प्रयासों से 20 वार्डों में यह पहल फैली, शौचालय-विहीन 1,299 परिवारों तक पहुँची, और अब तक 832 शौचालय बन चुके हैं. यह कहानी दिखाती है कि एक महिला का नेतृत्व पूरे समुदाय में स्थाई बदलाव ला सकता है.
हर घर जल
थानपतकुची गाँव में सोरोला भुइयाँ ने उन परिवारों तक नल का पानी पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई, जो जल जीवन मिशन से अब तक नहीं जुड़ पाए थे. उन्होंने ऐसे घरों की पहचान की, उनकी समस्याएँ समझीं और उन्हें सम्बन्धित अधिकारियों तक पहुँचाया.
सोरोला ने, संयुक्त राष्ट्र परियोजना सेवा कार्यालय (UNOPS) की टीम और क्षेत्रीय कर्मियों के साथ लगातार समन्वय के ज़रिए, यह सुनिश्चित किया कि इन परिवारों की समस्याओं पर कार्रवाई हो. उनके प्रयासों से बाक़ी घर भी जल जीवन मिशन से जुड़ गए. आज इन परिवारों को अपने घरों में नल का सुरक्षित पानी नियमित रूप से मिल रहा है.
सेब और बेर
शिखा कहती है, “मेरे भाई और मुझे अलग-अलग तरह के फल और खाना मिलता है. महंगे फल उसके लिए होते थे, और सस्ते मेरे लिए.”
शिखा ने, स्कूल और समुदाय में हुए सत्रों के माध्यम से सीखा कि अच्छा पोषण लड़कियों के लिए भी उतना ही ज़रूरी है. वह कहती है, “बात सेब और बेर में से किसी एक को चुनने की नहीं होनी चाहिए. लड़कियों को भी अच्छा भोजन मिलना चाहिए.”
शिखा पुलिस अधिकारी बनना चाहती है और मानती है कि सशक्तिकरण की शुरुआत घर से होती है, जहाँ देखभाल और भोजन दोनों में बराबरी होनी चाहिए. नूह में आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, विश्व खाद्य कार्यक्रम (WFP) और सरकार के सहयोग से, परिवारों को यह समझाने में मदद कर रही हैं कि लड़कियों का पोषण एक स्वस्थ और बेहतर भविष्य के लिए बेहद ज़रूरी है.
सहनसक्षमता के बीज
“पिछले कुछ वर्षों में जलवायु परिवर्तन के साथ हमारा संघर्ष और गहरा हुआ है. लेकिन हमने मेहनत करनी नहीं छोड़ी. हमारे धैर्य और हमारे समुदाय की सहनशीलता ने हमें आगे बढ़ते रहने की ताक़त दी है.”
प्रणिता बोरा राजखोवा अपने पति और दो बेटों के साथ रहती हैं और एक स्थानीय स्वयं सहायता समूह की सक्रिय सदस्य हैं. वह, हर साल बाढ़ से प्रभावित अपने समुदाय में परिवारों को कुशल बीज अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हैं.
यह खेती का ऐसा तरीक़ा है, जो पैदावार बढ़ाने और आय मज़बूत करने में मदद करता है. प्रणिता अब, सामुदायिक प्रशिक्षणों का नेतृत्व कर रही हैं और महिलाओं को बता रही हैं कि बेहतर बीज एवं कृषि पद्धतियाँ किस तरह फ़सलों की रक्षा कर सकती हैं तथा आजीविका को मज़बूत बना सकती हैं.
फ़सल से अवसर तक
पेड़ों की छाया में खड़ी ये महिलाएँ अपने हाथों में बेर के तैयार डिब्बे थामे हुए हैं. इन फलों को उन्होंने सावधानी से इकट्ठा किया, छाँटा, पैक किया और डिब्बों में बन्द किया. हर डिब्बा उनके कौशल, मेहनत और बढ़ती आर्थिक आत्मनिर्भरता की कहानी कहता है.
TEEBAgriFood निजी क्षेत्र कार्यक्रम के तहत हुए प्रशिक्षणों से एब्रोसा प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ी महिलाएँ अब अपने काम के असली मूल्य को बेहतर समझ रही हैं.
वे रिकॉर्ड रखना, भुगतान, अनुबन्ध और वित्तीय अवसरों के बारे में सीख रही हैं. यहाँ हर डिब्बा केवल एक उत्पाद नहीं, बल्कि गरिमा, आत्मविश्वास और नए आर्थिक अवसर का प्रतीक है.
डेयरी के काम से स्थाई अवसर
संघामित्रा महिला उत्पादक समूह, असम का एक महिला-नेतृत्व वाला किसान उत्पादक संगठन है, जो डेयरी उत्पादन और दूध से बने उत्पादों में मूल्य संवर्धन का काम करता है. चिरांग ज़िले के उलुबारी गाँव में इसकी सदस्य महिलाएँ दूध संग्रह, बिल और अभिलेखों का काम सम्भालते हुए पनीर, घी और अन्य उत्पाद तैयार करती हैं. यह काम उनकी आजीविका के साथ-साथ निर्णय लेने में उनकी भूमिका को भी मज़बूत कर रहा है.
TEEBAgriFood निजी क्षेत्र कार्यक्रम के माध्यम से ये महिलाएँ अब अपने डेयरी उद्यम की वास्तविक लागत, लाभ और संसाधनों की भूमिका को बेहतर समझ रही हैं. इससे उन्हें उचित दाम पाने, वित्तीय संस्थानों में भरोसा बनाने और भविष्य के लिए बेहतर निर्णय लेने में मदद मिल रही है. यहाँ अभिलेखन, केवल दूध का हिसाब नहीं, बल्कि महिलाओं के श्रम को स्थाई अवसर में बदलने का माध्यम बन रहा है.
हरित आवास क्रान्ति की अगुवाई करता ओडिशा का ट्रांसजेंडर समुदाय
ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में ट्रांसजेंडर समुदाय समावेशी और जलवायु-सहनसक्षम आवास की नई मिसाल पेश कर रहा है. प्रगति विहार में, जगा मिशन के तहत सुरक्षित भूमि अधिकार मिलने से प्रधानमंत्री आवास योजना–शहरी के माध्यम से आवास सब्सिडी तक पहुँच सम्भव हुई.
यहाँ के निवासियों ने, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) और उसके साझीदारों के सहयोग से, ऐसे घरों की सह-रचना की, जो अधिक सुरक्षित, ठंडे और संसाधनों के बेहतर उपयोग वाले हैं.
इन घरों में बाढ़ से सुरक्षा के लिए ऊँचे चबूतरे, छायादार अर्ध-खुले आँगन, हवा की बेहतर आवाजाही, छत पर सौर ऊर्जा और वर्षा जल संचयन जैसी विशेषताएँ शामिल हैं. कम-कार्बन निर्माण तकनीकों से कंक्रीट और इस्पात के उपयोग में 30 प्रतिशत की कमी आई और प्रति इकाई क्षेत्र में अन्तर्निहित कार्बन 16 प्रतिशत घटा.
प्रगति विहार दिखाता है कि गरिमा, समावेशन एवं जलवायु कार्रवाई साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं, और यह मॉडल बड़े पैमाने पर भी अपनाया जा सकता है.
कचरे से काम और गरिमा तक की यात्रा
अमृतसर की बंगला कॉलोनी में पली-बढ़ी कोमल ने अपना बचपन कचरे के ढेर से चीज़ें बटोरते हुए बिताया. बाद में उन्हें अपने दो बच्चों की परवरिश अकेले करनी पड़ी. कचरा बीनने वाली कई अन्य महिलाओं की तरह उनका काम अनौपचारिक, कम आय वाला और लगभग अदृश्य बना रहा.
कोरोनावायरस बीमारी महामारी के दौरान उनकी आय और घट गई. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के सहयोग से लागू ‘उत्थान परियोजना’ के ज़रिए से कोमल को स्वास्थ्य सेवाएँ, खाद्य सहायता और वित्तीय साक्षरता का प्रशिक्षण मिला.
इसी मदद से उन्होंने ऋण लेकर प्लास्टिक कचरा इकट्ठा करने और बेचने के लिए एक छोटी दुकान खोली. आज वह अधिक स्थिर आय अर्जित कर रही हैं और अपने समुदाय की दूसरी महिलाओं को भी आजीविका मज़बूत करने में मदद दे रही हैं.