मध्य पूर्व

© UNICEF/Eyad El Baba
मैं अन्तरराष्ट्रीय समुदाय में अपने सहयोगियों से अपील करता हूँ कि वो ग़ाज़ा के लोगों को ना भुलाएँ, उन फ़लस्तीनियों को ना भुलाएँ जो कई पीढ़ियों से अपने देश के बिना ही रहते आए हैं. और हम सबके साथ, संयुक्त राष्ट्र के साथ मिलकर, बल्कि उन सभी के साथ मिलकर काम करें जो फिलहाल समस्या का समाधान तलाश करने की कोशिश कर रहे हैं. ग़ाज़ा के लोग बहुत ज़्यादा लड़ाई और तबाही देख चुके हैं.

निकोलय म्लैदेनॉफ़, 
मध्य पूर्व शान्ति प्रक्रिया के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष संयोजक
15 जुलाई 2018 को ग़ाज़ा में प्रेस से टिप्पणी
 

संक्षिप्त विवरण (OVERVIEW)

संयुक्त राष्ट्र मध्य पूर्व क्षेत्र में तनाव को कम करने और ज़मीनी स्थिति में बेहतरी लाने के लिए क्षेत्रीय और अन्तरराष्ट्रीय हस्तियों और संगठनों के साथ सहयोग और तालमेल करता है. साथ ही क्षेत्र में न्यायपूर्ण और टिकाऊ शान्ति के लक्ष्य की दिशा में काम करते हुए इसराइल और फ़लस्तीन के रूप में दो राष्ट्रों की स्थापना के लिए राजनैतिक वार्ता को बढ़ावा और समर्थन देता है.

संयुक्त राष्ट्र और फ़लस्तीन का मुद्दा

 

UNICEF

महासचिव (Secretary General)

संयुक्त राष्ट्र महासचिव मध्य पूर्व क्षेत्र में ख़ुद या अपने दूतों और प्रतिनिधियों के ज़रिए सक्रिय रहते हुए संघर्ष को पहले से ही रोकने और शान्ति को बढ़ावा देने व शान्ति स्थापना के लिए काम करते हैं. मध्य पूर्व के लिए चार पक्षीय संगठन में संयुक्त राष्ट्र का प्रतिनिधित्व भी महासचिव ही करते हैं. मध्य पूर्व शान्ति प्रक्रिया के लिए संयुक्त राष्ट्र के संयोजक क्षेत्र में शान्ति प्रक्रिया से संबंधित तमाम मामलों और गतिविधियों में उनका प्रतिनिधित्व करते हैं. 

संयुक्त राष्ट्र महासभा (General Assembly)

संयुक्त राष्ट्र के तमाम सदस्य देशों से बनी महासभा 1947 से ही फ़लस्तीनी मुद्दे का शान्तिपूर्ण और टिकाऊ हल निकालने के प्रयासों में शामिल रही है. फ़लस्तीनी लोगों के बुनियादी अधिकारों के इस्तेमाल के लिए एक कमेटी 1975 में बनाई गई थी. 

सुरक्षा परिषद (Security Council)

सुरक्षा परिषद पर अन्तरराष्ट्रीय शान्ति और सुरक्षा बनाए रखने की मुख्य ज़िम्मेदारी है. सुरक्षा परिषद ने मध्य पूर्व की स्थिति और फ़लस्तीन के मुद्दे पर बहुत से मौक़ों पर ध्यान दिया है.

UNRWA

निकट पूर्व में फ़लस्तीनी शरणार्थियों के लिए सहायता एजेंसी (UNRWA) मध्य पूर्व क्षेत्र में लगभग सबसे बड़ा कार्यकारी संगठन है. ये एजेंसी जॉर्डन, लेबनान, सीरिया, ग़ाज़ा, पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम में क़रीब 50 लाख फ़लल्तीनी शरणार्थियों को शिक्षा, स्वास्थ्य, राहत कार्य और सामाजिक सेवाएँ मुहैया कराने का काम करती है.

संयुक्त राष्ट्र समझौता निगरानी संगठन – (UNTSO)

इस संगठन को सुरक्षा परिषद ने 1948 में फ़लस्तीन के लिए प्राधिकृत किया था. संयुक्त राष्ट्र द्वारा स्थापित ये पहला शान्ति स्थापना अभियान था.

मानवाधिकार परिषद (Human Rights Council)

मानवाधिकार परिषद फ़लस्तीन की स्थिति को अपने नियमित और विशेष सत्रों में चर्चा का मुद्दा बनाती रही है. मानवाधिकार परिषद फ़लस्तीनी क्षेत्रों में मानवाधिकारों की स्थिति का जायज़ा लेने के लिए विशेष रिपोर्टियर के ज़रिए निगरानी रखती है. ग़ौरतलब है कि कुछ फ़लस्तीनी क्षेत्रों पर इसराइल ने 1967 में क़ब्ज़ा कर लिया था.

मध्य पूर्व शान्ति प्रक्रिया के लिए संयुक्त राष्ट्र के विशेष संयोजक – (UNSCO)

विशेष संयोजक मध्य पूर्व में शान्ति प्रक्रिया से संबंधित तमाम गतिविधियों और राजनैतिक व कूटनीतिक प्रयासों में महासचिव का प्रतिनिधित्व करते हैं. मध्य पूर्व के लिए चार पक्षीय संगठन में भी विशेष संयोजक ही संयुक्त राष्ट्र की नुमाइन्दगी करते हैं. विशेष संयोजक ही इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी इलाक़ों में मानवीय सहायता और विकास कार्यक्रमों में तालमेल स्थापित करते हैं. इसके अलावा फ़लस्तीनी प्राधिकरण और फ़लस्तीनी लोगों के लिए समर्थन व सहायता मुहैया कराने का काम भी उन्हीं की देखरेख में होता है.

प्रमुख मुद्दे - Key Issues

 

 इसराइल और फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) के बीच 1993 में फ़लस्तीनियों के लिए अन्तरिम स्वशासन के इंतेज़ाम के सिद्धांतों पर समझौता हुआ था. उस समझौते के ज़रिए कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों को भविष्य में टिकाऊ प्रवृत्ति की बातचीत होने तक ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था. ये बातचीत 2000-2001, 2007-2008 और 2013-2014 में हुईं तो लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकले. 

स्थाई स्थिति और महत्वपूर्ण मुद्दों पर फ़लस्तीनी लोगों के बुनियादी अधिकारों पर बनी कमेटी (The Committee on the Exercise of the Inalienable Rights of the Palestinian People) की नज़र में ये महत्वपूर्ण मुद्दे (key issues) हैं...

महत्वपूर्ण मुद्दों पर फ़लस्तीनी लोगों के बुनियादी अधिकारों पर बनी कमेटी  (Committee on the Exercise of the Inalienable Rights of the Palestinian People  (कमेटी) ने फ़लस्तीनी इलाक़ों पर इसराइली क़ब्ज़े को ख़त्म करने और फ़लस्तीन मुद्दे का सभी नज़रिये से हल निकालने के लिए शांतिपूर्ण बातचीत के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन किया है. ये प्रयास अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के आधार पर किए गए हैं. कमेटी ने 1991 में हुए मैड्रिड शांति प्रक्रिया का स्वागत किया. इसके अलावा इसराइल और फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) के बीच हुए 1993 के घोषणा-पत्र और उसके बाद हुए समझौतों का भी स्वागत किया.

2002 में कमेटी ने उस नज़रिए और दृष्टिकोण का भी स्वागत किया जिसमें कहा गया कि मध्य पूर्व क्षेत्र में इसराइल और फ़लस्तीन के रूप में दो राष्ट्र एक साथ मौजूद रह सकते हैं जिनकी सुरक्षित और मान्य सीमाएँ होंगी. इस आशय का एक प्रस्ताव -1397 सुरक्षा परिषद ने 2002 में पारित किया. कमेटी ने इस लक्ष्य को व्यवस्थित तरीक़े से राजनैतिक, आर्थिक और सुरक्षा के क्षेत्रों में प्रगति हासिल करते हुए यथाशीघ्र प्राप्त करने का भी आग्रह किया. इसके लिए एक समय सीमा निर्धारित करने की भी पेशकश की गई. इसी संदर्भ में 28 मार्च 2002 को बेरूत में अरब देशों के एक सम्मेलन में स्वीकृत किए गए शान्ति प्रस्तावों का भी कमेटी ने स्वागत किया और इसराइल से भी सदइच्छा दिखाते हुए सकारात्मक क़दम उठाने को कहा.

कमेटी मध्य पूर्व के मुद्दे पर चार पक्षीय कूटनीतिक संगठन के प्रयासों का भी समर्थन करती है. इस संगठन में अमरीका, रूस, यूरोपीय संघ और ख़ुद संयुक्त राष्ट्र शामिल हैं. इस संदर्भ में ख़ासतौर से इसराइल और फ़लस्तीनी संघर्ष को ख़त्म करने और दो राष्ट्रों के रूप में समाधान निकालने के लिए बनाए गए रोडमैप को प्रोत्साहित किया जाता है. इस रोडमैप को सुरक्षा परिषद ने 2003 में अपने प्रस्ताव संख्या 1515 के ज़रिए मंज़ूर किया था. कमेटी ने चार पक्षीय संगठन और अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अनुरोध किया कि इस रोडमैप के अनुसार जो भी पक्ष अपनी ज़िम्मेदारी निभाने की कोशिश कर रहे हैं, उन्हें भरपूर समर्थन दिया जाए. फ़लस्तीनी इलाक़ों में इसराइल द्वारा बसाई जा रही यहूदी बस्तियों को तुरन्त रोकने और सुरक्षा मुहैया कराने पर ख़ास ज़ोर दिया गया. 

कमेटी की नज़र में ये रोडमैप फ़लस्तीनी मुद्दे का टिकाऊ समाधान एक न्यायसंगत तरीक़े से हासिल करने का एक व्यापक रास्ता पेश करता है. ये हल सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों – 242 (1967), 338 (1973), 1397 (2002) और 1515 (2003) के अनुरूप होगा. साथ ही इस रोडमैप में 1967 की सीमाओं के आधार पर दो राष्ट्रों की सीमाएँ निर्धारित करने, फ़लस्तीनी लोगों के बुनियादी अधिकारों को मान्यता देने और क्षेत्र में सभी देशों को शान्ति और सुरक्षा के साथ मौजूद रहने का अधिकार सुनिश्चित करने की भी बात की गई है.

कमेटी का विश्वास है कि इसराइल और फ़लस्तीन के रूप में दो राष्ट्रों के रूप में समाधान निकालने के लिए ज़रूरी है कि सभी पक्ष अतीत में किए गए तमाम समझौतों और वायदों पर अमल करें.
 

कमेटी समस्या का पूर्ण समाधान दो राष्ट्रों की स्थापना के रूप में किए जाने का पूरा समर्थन करती है. ये राष्ट्र होंगे इसराइल और फ़लस्तीन जो एक दूसरे द्वारा मान्य साझी सीमाओं के आधार पर शान्ति और सुरक्षा के साथ पड़ोसी देशों के रूप में रहेंगे. कमेटी का विश्वास है कि दो राष्ट्रों के रूप में समाधान सिर्फ़ 1967 से पहले की सीमाओं के आधार हासिल किया जा सकता है. 1967 से पूर्व की सीमाओं को ग्रीन लाइन कहा गया है. कमेटी का ये भी मानना है कि इसराइल और फ़लस्तीन के बीच 1949 की सीमाओं में कोई बदजलाव आपसी बातचीत और सहमति के ज़रिए ही किया जा सकता है. कमेटी का ये भी ज़ोरदार तरीक़े से मानना है कि संबद्ध पक्षों के बीच आपसी बातचीत और सहमति के आधार पर जब तक कोई समाधान नहीं निकलता है, तब तक सभी पक्षों को ज़मीनी स्थिति में एक पक्षीय तरीक़े से कोई बदलाव करने से सख़्ती से बचना चाहिए.
कमेटी ने इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी इलाक़ों (पूर्वी येरूशलम सहित) में बनाई गई विभाजन दीवार और अन्य ऐसी बाधाओं का ज़ोरदार विरोध किया है जो फ़लस्तीनी लोगों पर पाबन्दियाँ लगाने के लिए बनाई गई हैं. ये गतिविधियाँ और निर्माण कार्य 1967 से पहले की सीमाओं के ख़िलाफ़ है. साथ ही इसराइल ने फ़लस्तीनी इलाक़े में ज़मीन और संपदाओं पर क़ब्ज़ा किया है और संपदाओं की तबाही भी की है. इसराइल की इन गतिविधियों की वजह से हज़ारों फ़लस्तीनियों को विस्थापित होना पड़ा है. 

कमेटी ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (आईसीजे) द्वारा 9 जुलाई 2004 को दी गई सलाहकारी राय (Advisory Opinion) का भी स्वागत किया जिसमें ये स्पष्ट और ज़ोरदार तरीक़े से निर्धारित किया गया कि इसराइल द्वारा बनाई गई विभाजन दीवार अन्तरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अवैध है. कमेटी ने महासभा के प्रस्ताव संख्या - A/RES/ES-10/15 का भी स्वागत किया जिसे 20 July 2004 को पारित किया गया. इस प्रस्ताव में आईसीजे की सलाहकारी राय का स्वागत किया गया और इसराइल से इस सलाहकारी राय में निहित क़ानूनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करने की माँग की गई. 

कमेटी इस बारे में गंभीर रूप से चिंतित है कि सुरक्षा कारणों के नाम पर इस विभाजन दीवार के निर्माण के ज़रिए इसराइल सरकार ने दरअसल और ज़्यादा फ़लस्तीनी ज़मीन को छीनने के इरादे पर काम किया है. इस तरह इसराइल अप्रत्यक्ष रूप से भविष्य के फ़लस्तीनी राष्ट्र की सीमाएँ इकतरफ़ा तौर पर निर्धारित कर रहा है और एक तरह से स्थाई समाधान के लिए पहले से ही परिणाम निर्धारित कर रहा है.

कमेटी का ये मानना है कि इसराइल को फ़लस्तीनी ज़मीन पर इस तरह के किसी विभाजन ढाँचे का निर्माण करने का कोई अधिकार नहीं है. कमेटी की माँग है कि पूर्वी येरूशलम सहित क़ब्ज़ा किए हुए अन्य फ़लस्तीनी इलाक़ों में विभाजन दीवार के निर्माण की गतिविधियाँ तुरंत बंद होनी की जाएँ. अभी तक विभाजन दीवार और अन्य निर्मित बाधाएँ ढाँचे तुरंत ध्वस्त किए जाएँ. आईसीजे और महासभा के प्रस्तावों में यही माँगें की गई हैं. इसराइल द्वारा ये विभाजन दीवार और अन्य ढाँचे बनाने के लिए जो भी वैधानिक और क़ानूनी प्रावधान किए गए हैं, उन्हें रद्द किया जाए या निष्प्रभावी घोषित किया जाए. इसराइल की ये ज़िम्मेदारी है कि वो इस विभाजन दीवार और अन्य संबंधित ढाँचों के निर्माण के दौरान जो नुक़सान हुआ है उसके लिए फ़लस्तीनियों को मुआवज़ा दे. इस संदर्भ में कमेटी संयुक्त राष्ट्र के नुक़सान रजिस्टर (United Nations Register of Damage ) द्वारा दिए गए आदेश का समर्थन करते हुए इसके बिना देरी के लागू किए जाने की माँग करती है.   

कमेटी का रुख़ है कि इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा किए हुए पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम में यहूदी बस्तियों का निर्माण अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत अवैध है. इसराइल द्वारा इन यहूदी बस्तियों के निर्माण से रोडमैप में इसराइल की ज़िम्मेदारियों का उल्लंघन होता है और इनसे शांति प्रक्रिया के लिए गंभीर रूकावट पैदा होती है. चौथे जिनीवा कन्वेंशन के अनुच्छेद 49 इस तरह की औपनिवेशिक गतिविधियों को साफ़ तौर पर निषिद्ध किया गया है. इसमें स्पष्ट तौर पर कहा गया है, “क़ब्ज़ा करने वाली ताक़त या देश अपनी ख़ुद की नागरिक आबादी को क़ब्ज़ा किए हुए इलाक़ों में नहीं भेजेगा.” 

इसी रुख़ को सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव संख्या 465 (1980) में समर्थन दिया गया था. इसमें साफ़तौर पर कहा गया कि फ़लस्तीनी और अन्य अरब इलाक़ों में इसराइल द्वारा अपनी आबादी और नए आप्रवासियों को बसाने की गतिविधियों जिनीवा कन्वेंशन का उल्लंघन होता है. ग़ौरतलब है कि इनमें 1967 में क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी इलाक़े और पूर्वी येरूशलम शामिल हैं.

कमेटी ने फ़लस्तीनी इलाकों में यहूदी बस्तियाँ बसाने की तमाम गतिविधियों को अंतरराष्ट्रीय क़ानून, शांति रोडमैप और अन्य समझौतों के तहत इसराइल की ज़िम्मेदारियों के अनुरूप तुरंत बंद किए जाने का आहवान किया है. इन सभी में यहूदी बस्तियों के विस्तार संबंधी गतिविधियों को तुरंत रोके जाने को कहा गया है, इनमें तथाकथित “Natural Growth” यानी क़ुदरती बढ़ोत्तरी पर भी रोक लगाना शामिल है. इस मुद्दे पर इसराइली कार्रवाई उसकी मंशा को ज़ाहिर करेगी कि वो सभी स्थाई मुद्दों पर गंभीर बातचीत करने के लिए कितना गंभीर है ताकि संघर्ष का समाधान दो राष्ट्रों के रूप में निकाला जा सके.

कमेटी इसराइल इन दावों को मान्यता नहीं देती कि पूरा येरूशलम शहर उसकी राजधानी है. इस संदर्भ में पूर्वी येरूशलम को फ़लस्तीनी क्षेत्र का अटूट हिस्सा माना जाता है. पूर्वी येरूशलम पर इसराइल ने 1967 से ही क़ब्ज़ा किया हुआ है. कमेटी का मानना है कि आपसी बातचीत के ज़रिए ही येरूशलम के दर्जे के बारे में कोई फ़ैसला किया जाए. और ऐसा करते समय सभी समूहों की राजनैतिक और धार्मिक आस्थाओं संबंधी चिंताओं को भी ध्यान में रखा जाए.

इसराइली-फ़लस्तीनी संघर्ष के एक टिकाऊ समाधान और मध्य पूर्व में शांति स्थापना के लिए ऐसा करना बहुत ज़रूरी होगा. इस मुद्दे के किसी भी समाधान में ये भी ध्यान में रखा जाए कि निवासियों की धार्मिक स्वतंत्रओं और आस्था संबंधि गतिविधियों की गारंटी हो. फ़लस्तीनी लोगों के साथ-साथ अमन्य धार्मिक और राष्ट्रीयताओं वाले लोगों को भी धार्मिक स्थानों तक पहुँचने की बिना किसी बाधा के आज़ादी हो. ऐसा कोई भी समाधान टिकाऊ शांति स्थापित नहीं कर सकेगा जिसमें पूर्वी येरूशलम को भविष्य के फ़लस्तीनी राष्ट्र की राजधानी के तौर पर मान्यता ना दी जाए. कमेटी ज़ोर देकर कहती है कि पूर्वी येरूशलम इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी इलाक़ों का हिस्सा है और क़ब्ज़ा करने वाला देश होने के नाते इसराइल की ये ज़िम्मेदारी है कि वो अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत अपनी ज़िम्मेदारियों को पूरा करे. इनमें चौथी जिनीवा केन्वेंशन के प्रावधान भी शामिल हैं. इसराइल द्वारा पूर्वी येरूशलम को छीनने की कार्रवाई को अंतरराष्ट्रीय समुदाय कभी भी मान्यता नहीं देगा.

कमेटी का रुख़ है कि फ़लस्तीनी इलाक़ों में इसराइल सरकार की इजाज़त से यहूदी बस्तियों के निर्माण गतिविधियों, वहाँ यहूदी आबादी को बसाना, फ़लस्तीनियों के घरों को ध्वस्त करना, फ़लस्तीनी निवासियों को वहाँ से जबरन बाहर निकालना और ज़मीनी स्थिति को बदलने और जनसंख्या के ढाँचे को बदलने के इरादे से चलाई जा रही इसी तरह की अन्य गतिविधियाँ अंतरराष्ट्रीय क़ानून के तहत ग़ैर-क़ानूनी हैं और तुरंत बंद की जाएँ और जो निर्माण हो चुका है उसे रद्द करके पहले की स्थिति में लाया जाए.

फ़लस्तीनी शरणार्थियों का मुद्दा इसराइली-फ़लस्तीनी संघर्ष का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है. इस मुद्दे का कोई न्यायसंगत समाधान महासभा के 11 दिसंबर 1948 में पारित किए गए प्रस्ताव संख्या - 194 (III) के प्रावधानों के अनुसार निकाला जाना इसराइल-फ़लस्तीन के साथ-साथ पूरके मध्य पूर्व क्षेत्र की शांति के लिए बेहद ज़रूरी है. कमेटी का रुख़ है कि फ़लस्तीनी शरणार्थियों की समस्या का कोई टिकाऊ समाधान इस संदर्भ में ही निकाला जा सकता है कि फ़लस्तीनी शरणार्थियों को अपने घरों और संपत्तियों को वापिस लौटने का अधिकार है जिनसे उन्हें पिछले दशकों के दौरान बेदख़ल कर दिया गया है.

कमेटी का ये भी रुख़ है कि इसराइल द्वारा क़ब्ज़ा करने संबंधी गतिविधियों के ज़रिए फ़लस्तीनियों के साथ जो अन्याय हुआ है, उसकी भरपाई करके ही फ़लस्तीनी लोगों के साथ कुछ हद तक न्याय हो सकता है. फ़लस्तीनी शरणार्थियों के नाज़ुक हालात और उनके विस्थापन के बहुत ख़राब हालात की माँग है कि एक ऐसा टिकाऊ हल निकाला जाए जो अंतरराष्ट्रीय क़ानून के सिद्धांतों और विश्व के अन्य स्थानों पर संघर्षों को कामयाब समाधान से सीखे गए सबक़ के उसूलों पर आधारित हो. फ़लस्तीनी शरणार्थियों के हालात को बेहतर बनाने और उनकी सहायता के लिए चलाई गईं विभिन्न योजनाएँ और  संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी द्वारा किए गए तमाम काम और गतिविधियाँ अंतरिम उपायों के तौर पर चलाई गई हैं, इनकी मौजूदगी में फ़लस्तीनी शरणार्थियों की फ़लस्तीनी इलाक़ों को वापसी का अधिकार किसी भी तरह से कमज़ोर नहीं पड़ता है.

कमेटी संघर्ष के समाधान के रूप में दो राष्ट्रों की स्थापने के तमाम प्रयासों का समर्थन करती है. इस समाधान के बाद एक स्वतंत्र, संप्रभु, टिकाऊ राष्ट्र और अच्छे पड़ोसी देश के रूप में फ़लस्तीन इसराल के साथ शांति और सुरक्षा के साथ फल-फूल सकेगा. इसका आधार 1967 से पहले की सीमाओं पर आधारित होगा. कमेटी क्षेत्र में रहने वाले तमाम लोगों की सुरक्षा, संरक्षा और अच्छी जीवन शैली की महत्ता पर ख़ास ज़ोर देती है जोकि अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानूनों के तहत उपलब्ध कराई जाएँ.

कमेटी हिंसा की किसी भी तरह गतिविधियों की निंदा करती है चाहे वो क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी इलाक़ों में इसराइली सेना के हमले और फ़लस्तीनियों को गिरफ़्तार किए जाने की घटनाएँ हों, या फिर ग़ाज़ा पट्टी की तरफ़ से इसराइली इलाक़ों की तरफ़ दाग़े जाने वाले रॉकेट. कमेटी तमाम हिंसक गतिविधियों को तुरंत रोके जाने की माँग करती है, इनमें सेना के हमले, संपत्तियों की तबाही और आतंकवादी गतिविधियाँ सभी शामिल हैं.

कमेटी क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी इलाक़ों (पूर्वी येरूशलम और ग़ाज़ा सहित) में लगातार हो रही सुरक्षा संबंधी ख़तरनाक़ घटनाओं पर बहुत चिंतित है जिनमें बड़े पैमाने पर लोग हताहत हो रहे हैं, उनमें ज़्यादातर फ़लस्तीनी आम लोग होते हैं. कमेटी फ़लस्तीनी इलाक़ों में बसाए जाने वाले इसराइलियों द्वारा बड़े पैमाने पर की जा रही क्रूर गतिविधियों पर भी बहुत चिंतित है. ये इसराइली लोग (Settlers) फ़लस्तीनी इलाक़ों में फ़लस्तीनी सार्वजनिक इमारतों और लोगों की निजी संपत्ति को बड़े पैमाने पर नुक़सान पहुँचाते हैं. इससे सांस्कृतिक विरासत और धरोहरों को ऐसा नुक़सान हो रहा है जिसकी भरपाई नहीं हो सकती. फ़लस्तीनी लोग आंतरूक रूप से विस्थापित और बेघर हो रहे हैं, फ़लस्तीनियों को गिरफ़्तार करने के अभियान लगातार चलते रहते हैं, फ़लस्तीनियों की सिविल आबादी को सामूहिक रूप से दंडित करने की मंशा से कार्रवाई होती है, ख़ासतौर से ग़ाज़ा में सामाजिक और आर्थिक ढाँचा तितर-बितर हो रहा है और फ़लस्तीनी लोगों के हालात दिन ब दिन बद से बदतर हो रहे हैं. और ये सब ग़ाज़ा की आर्थिक नाकेबंदी की वजह से हो रहा है.

कमेटू ने फ़लस्तीनी प्राधिकरण द्वारा सुरक्षा ढाँचे को मज़बूत करने और उसमें सुधार करने के लिए उठाए गए क़दमों की सराहना की है. कमेटी ने दोनों पक्षों से सुरक्षा क्षेत्र में सहयोग करते रहने की पुकार लगाई है जिसके ज़रिए दोनों देशों के लोगों की भलाई के लिए भरोसा क़ायम रह सके.

कमेटी का ज़ोर देकर कहना है कि फ़लस्तीनी लोगों को अपने क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों पर सम्पूर्ण अधिकार है जिसे छीना नहीं जा सकता. इस अधिकार की पुष्टि संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव संख्या A/RES/71/247 में भी की गई है जिसे 21 दिसंबर 2016 को पारित किया गया था. इस संदर्भ में कमेटी महासभा की इस माँग का पूरा समर्थन करती है कि इसराइल (क़ाबिज़ देश) क़ब्ज़ा किए हुए फ़लस्तीनी इलाक़ों में प्राकृतिक संसाधनों का दोहन या उन्हें नुक़सान पहुँचाने की गतिविधियाँ तुरंत बंद कर दे. इनमें पूर्वी येरूशलम भी शामिल है.

कमेटी ने फ़लस्तीनी लोगों को उनकी अपनी ज़मीन में जल संसाधनों के इस्तेमाल से रोकने की इसराइल की भेदभावपूर्ण कार्रवाई का ज़ोरदार विरोध किया है. जबकि इन्हीं जल संसाधनों से इसराइली नागरिकों को पानी की भरपूर् मात्रा मुहैया कराई जाती है. यहाँ तक क़ब्ज़ा किए हुए पश्चिमी तट और पूर्वी येरूशलम में ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से बसाए गए यहूदी निवासियों को भी ये जल संसाधान खुली मात्रा में मिलते हैं.

किसी भी टिकाऊ समाधान में जल संसाधनों के बँटवारे और उपलब्धता के न्यायसंगत अधिकार को अंतरराष्ट्रीय क़ानून के दायरों के अनुसार मान्यता दी जए. ये भी ध्यान रखा जाए कि प्राकृतिक संसाधनों को कोई नुक़सान ना पहुँचाया जाए. साथ ही ऐसी किसी बड़ी परियोजना शुरू करने से पहले सूचित करने की ज़िम्मेदारी पूरी की जाए जिससे पड़ोसी देश के जल संसाधनों की उपलब्धता पर असर पड़ने की संभावना हो. 

 

मुख्य दस्तावेज़ - Key Documents

फ़लस्तीन के मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की सूचना प्रणाली - The United Nations Information System on the Question of Palestine (UNISPAL) की स्थापना फ़लस्तीनियों के अधिकार विभाग ने महासभा की विभिन्न अनुशंसाओं पर की थी और यही विभाग इस सूचना प्रणाली की देखरेख करता है. इस विभाग के पास फ़लस्तीन मुद्दे और मध्य पूर्व क्षेत्र में स्थिति और शांति की तलाश से संबंधित संयुक्त राष्ट्र के मौजूदा और ऐतिहासिक दस्तावेज़ व सामग्री संकलित है. UNISPAL के पास सामग्री मुख्य रूप से इंगलिश में उपलब्ध है मगर कुछ अन्य आधिकारिक भाषाओं में इस सामग्री का विस्तार किया जा रहा है.

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फ़लस्तीन के मुद्दे से संबंधित प्रस्ताव

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